
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
125 days ago
यह एक अत्यंत प्रेरणादायक और प्रसिद्ध संस्मरण है, जो स्वामी विवेकानंद के जीवन के 'अहंकार के विसर्जन' और 'समदृष्टि' के बोध को दर्शाता है। स्वामी विवेकानंद और नर्तकी: आत्मबोध की कहानी यह घटना 1891 की है, जब स्वामी विवेकानंद अपने देशव्यापी भ्रमण के दौरान खेतड़ी (राजस्थान) के महाराजा अजीत सिंह के अतिथि बने थे। (अक्सर इसे जयपुर के प्रसंग में भी सुना जाता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह खेतड़ी की घटना है)। 1. अनपेक्षित स्वागत महाराजा ने स्वामी जी के सम्मान में एक भव्य दरबार का आयोजन किया और उस समय की प्रसिद्ध नर्तकी (मैना बाई) को गायन के लिए आमंत्रित किया। स्वामी जी, जो उस समय एक युवा संन्यासी थे और कंचन-कामिनी के मोह से दूर रहने के लिए कठोर अनुशासन का पालन कर रहे थे, इस बात से क्षुब्ध हो गए। उन्हें लगा कि एक संन्यासी के सामने नाच-गाने का क्या काम? वे नर्तकी को देखने से बचने के लिए अपने कक्ष में चले गए और बाहर आने से मना कर दिया। 2. नर्तकी का करुण पुकार जब महाराजा ने स्वामी जी से बाहर आने का अनुरोध किया, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया— "मैं एक संन्यासी हूँ, मेरा ऐसी स्त्रियों के साथ बैठना उचित नहीं है।" नर्तकी को जब यह पता चला, तो उसे बहुत ठेस पहुँची। उसने वहीं से गाना शुरू किया। उसने सूरदास जी का एक प्रसिद्ध पद गाया: "प्रभु जी, मेरे अवगुण चित न धरो..." उसका अर्थ था: "हे प्रभु, मेरे गुणों-अवगुणों पर ध्यान मत दीजिए। लोहा पूजा के घर में भी होता है और वधशाला (कसाई के घर) में भी, लेकिन पारस पत्थर दोनों में भेद नहीं करता, वह जिसे छूता है उसे सोना बना देता है। एक जल नली में बहता है और दूसरा यमुना की पवित्र धारा में, लेकिन जब दोनों गंगा में मिलते हैं, तो सब एक समान पवित्र हो जाते हैं।" 3. स्वामी जी का आत्म-साक्षात्कार उस नर्तकी के स्वर में इतना सच्चा वैराग्य और आँखों में इतने निष्कपट आँसू थे कि स्वामी जी के अंतर्मन में बिजली सी कौंध गई। उन्होंने महसूस किया कि: * भय वहीं होता है जहाँ भेद होता है। * अगर मैं उससे दूर भाग रहा हूँ, तो इसका अर्थ है कि मेरे भीतर अभी भी विकार (वासना या आकर्षण) का सूक्ष्म अंश बचा है। * एक पूर्ण संन्यासी वह है जो वेश्या और देवी, दोनों में एक ही परमात्मा को देखे। 4. बोध और परिवर्तन स्वामी जी तुरंत कक्ष से बाहर आए और उस नर्तकी के पास जाकर बोले, "माते, मुझे क्षमा करें। आज आपने मेरी आँखें खोल दीं। अब तक मैं 'माया' से डरा हुआ था, लेकिन आज आपने मुझे सिखाया कि ईश्वर सबमें है।" स्वामी जी ने स्वीकार किया कि उस दिन उस 'तुच्छ' समझी जाने वाली स्त्री ने उन्हें वह शिक्षा दी, जो शायद बड़े-बड़े ग्रंथ नहीं दे पाए थे। इसी घटना के बाद स्वामी जी की दृष्टि 'समदर्शी' हो गई, जहाँ ऊंच-नीच और पवित्र-अपवित्र का भेद मिट गया। इस कहानी का सार: यह कहानी हमें सिखाती है कि आध्यात्मिकता किसी को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि सबमें एक ही चैतन्य को देखने में है। ज्ञान कहीं से भी मिल सकता है, बस उसे ग्रहण करने के लिए हृदय का द्वार खुला होना चाहिए।

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