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3.1.2026 आज के संसार की स्थिति ऐसी हो चुकी है, कि *"लगभग प्रत्येक व्यक्ति दूसरों के दोष देखता रहता है, और सब दुनियां को दोषी मानता रहता है। अपने दोषों की ओर वह झांककर भी नहीं देखता, उन्हें स्वीकार करना तो बहुत दूर की बात है।" "अर्थात बहुत से लोग संसार में बिगड़ चुके हैं। ऐसे बिगड़े हुए लोग स्वयं तो सुधरते नहीं, फिर भी दूसरों को सुधारने पर तुले हुए हैं।"* ऐसा सोचना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है, और ऐसा होना संभव भी नहीं है। *"यदि कोई व्यक्ति संसार के लोगों को सुधारना चाहता हो, उनका जीवन बदलना चाहता हो, तो पहले उसे अपना जीवन बदलना होगा। अपने दोषों को दूर करना होगा। अपने अंदर उत्तम गुणों व कर्मों को धारण करना होगा। तब उसके उत्तम आचरण को देखकर तो शायद कोई संस्कारी व्यक्ति बदल भी जाए, और उस जैसा अच्छा व्यक्ति बनने का प्रयास भी करे।"* *"परन्तु यदि कोई व्यक्ति, दूसरों को अच्छा व्यक्ति बनने का केवल सुझाव ही देता रहे, और अपने आचरण को न सुधारे, तो केवल सुझाव देने मात्र से कोई सुधरने वाला नहीं है।"* इस बात को अच्छी प्रकार से समझ कर चलना चाहिए। *"यदि कोई व्यक्ति आपके जीवन आचरण को देखकर और आपके सुझाव को सुनकर सुधरना चाहता हो, तो उसके लिए अवश्य प्रयत्न करें। और जो नहीं सुधरना चाहता, उसे छोड़ देवें। इसी से आपकी उन्नति भी होती रहेगी, और आप तनाव मुक्त होकर अपना जीवन जीएंगे। साथ ही साथ संसार का उपकार भी कर लेंगे।"* *"संसार की बिगड़ी हुई स्थिति को देखकर व्यर्थ में अपना और दूसरों का तनाव न बढ़ाएं। और किसी को भी जबरदस्ती सुधारने का प्रयत्न न करें। क्योंकि ज़बरदस्ती तो कोई आपको भी सुधारना चाहे, तो आप भी नहीं सुधरेंगे। फिर दूसरों के साथ जबरदस्ती करके उनके सुधरने की आशा क्यों रखते हैं?"* *"अतः यदि आप दूसरों को सुधारना चाहते हों, तो पहले अपना जीवन सुधारें, फिर दूसरों को सुधारने का प्रयत्न करें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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