
अंकित आर्य काशी गुप्त
390 days ago
🎶 गीत: “धरती माँ का वरदान” 🎶 (ध्रुवपंक्ति/कोरस): 🌿 हरियाली की ओढ़ चुनरिया, धरती माँ मुस्काए। पंचतत्त्व के पावन पथ पर, जीवन गीत सुनाए॥ 🌿 --- अंतरा 1: हरी-भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण। जल–वायु अग्नि, आकाश पावन, वर दें सुख का दोहन। वृक्ष बने छाया के साए, नदियाँ गाएँ जीवन राग॥ (ध्रुवपंक्ति) --- अंतरा 2: पर्वत, पवन, पशु–पक्षी सारे, हमसे पूछें अब अधिकार। क्या हम देंगे उत्तर उनको, या फिर होगा संहार? संरक्षण की राह चुनें हम, बने प्रकृति का सजग समाज॥ (ध्रुवपंक्ति) --- अंतरा 3: पुरखों के विज्ञान-धर्म की, परम्परा का करें वरण। यज्ञ, आयुर्वेद, वास्तु, कृषि में, देखें पर्यावरण। रचें सजीव समरसता ऐसी, जिसमें न क्षोभ, न द्वेष, न त्रास॥ (ध्रुवपंक्ति) --- अंतरा 4 (समापन): बीज प्रेम के बोएं फिर से, बने वनों की शान। सौर, पवन, जल से लें ऊर्जा, छोड़ें कार्बन का मान। “वसुधैव कुटुंबकम्” को जी लें, यही प्रकृति की सच्ची आस॥ (ध्रुवपंक्ति)

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