
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
66 days ago
*🟠 एकादशी व्रत: पापों का नाश और वैकुण्ठ प्राप्ति का दिव्य मार्ग* एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी पंद्रह दिवसीय पक्ष के ग्यारहवें दिन आती है। एक चंद्र मास के शुक्ल पक्ष में चंद्रमा अमावस्या से बढ़कर पूर्णिमा तक जाता है, और उसके अगले पक्ष में यानी कृष्ण पक्ष में वह पूर्णिमा से घटते हुए अमावस्या तक जाता है। इसलिए हर कैलेंडर महीने में एकादशी दो बार आती है। एक शुक्ल एकादशी जो बढ़ते हुए चंद्रमा के ग्यारहवें दिन आती है, और एक कृष्ण एकादशी जो घटते हुए चंद्रमा के ग्यारहवें दिन आती है। ऐसा निर्देश है कि हर वैष्णव को एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार की गई तपस्या भक्तिमयी जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी है। पद्म पुराण के चतुर्दश अध्याय में श्रील व्यासदेव एकादशी के उद्गम की व्याख्या जैमिनी ऋषि को इस प्रकार करते हैं कि इस भौतिक जगत की उत्पत्ति के समय भगवान ने पापियों को दंडित करने के लिए पापपुरुष की रचना की थी। इस पापपुरुष को नियंत्रित करने के लिए यमराज की उत्पत्ति हुई। जब भगवान ने देखा कि जीवात्माएं अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुख भोगते हुए नरकों में कष्ट पा रही हैं, तो परम कृपालु भगवान ने अपने ही स्वरूप से एकादशी के रूप को अवतरित किया। एकादशी और भगवान श्रीविष्णु अभिन्न हैं। जब एकादशी व्रत के प्रभाव से पापपुरुष का अस्तित्व खतरे में पड़ने लगा, तो वह भगवान विष्णु के पास रक्षा की प्रार्थना लेकर पहुँचा। तब भगवान विष्णु ने उसे एकादशी के दिन अन्न में निवास करने का स्थान दिया। इसीलिए वे मनुष्य जो अपने कल्याण के प्रति सजग हैं, वे एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं करते। सभी वैदिक शास्त्र एकादशी के दिन निर्जल उपवास की अनुशंसा करते हैं। आयु चाहे आठ वर्ष हो या अस्सी वर्ष, सबको इस दिन व्रत करने की सलाह दी गई है। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, उनके लिए दिन में एक बार भोजन करने की अनुशंसा है, परंतु उस स्थिति में भी किसी को भी किसी भी प्रकार से अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। एकादशी को सभी जीवों के परम लक्ष्य भगवद्-भक्ति को प्राप्त करने का साधन माना गया है। पापमयी इच्छाओं से मुक्त होकर एक भक्त इस दिन विशुद्ध भक्तिमयी सेवा कर सकता है। व्रत करने की क्रिया चेतना का शुद्धिकरण करती है और भक्त को भौतिक विचारों से मुक्त करती है। श्रील प्रभुपाद ने इस दिन कम से कम पच्चीस जप माला पूरी करने और भगवान की लीलाओं का स्मरण करने की अनुशंसा की है। शास्त्रों में यहाँ तक कहा गया है कि जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करते हैं, वे अपने माता, पिता, भाई एवं गुरु की मृत्यु के दोषी होते हैं। इस दिन किसी भी तरह के अन्न को ग्रहण करना सर्वथा वर्जित है, चाहे वह भगवान विष्णु को ही क्यों न अर्पित हो। एकादशी के दिन व्रत का मुख्य कारण अपनी शारीरिक जरूरतों को घटाकर अपना समय भगवान की सेवा में व्यय करना है। एकादशी के समान शुद्धि प्रदान करने वाला और पाप दूर करने वाला कोई अन्य दिन नहीं है। यदि कोई व्यक्ति केवल दिखावे के लिए भी एकादशी करता है, तो उसे मृत्यु के उपरांत यम का दर्शन नहीं होता। शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि एकादशी के दिन अन्न खाने वाला मनुष्य सब मनुष्यों में हीन है। जो लोग दशमी को एक बार भोजन करते हैं और एकादशी को उपवास रखते हैं, वे ही सही अर्थों में भक्ति पथ पर आगे बढ़ते हैं। इस दिन श्राद्ध, तर्पण, पिंड-दान जैसे कार्य भी नहीं करने चाहिए। शास्त्रों के अनुसार एक वैष्णव को द्वादशी के दिन कभी भी तुलसी पत्तों का चयन नहीं करना चाहिए। भली-भांति शास्त्र अध्ययन करने वाले व्यक्ति को रविवार के दिन दुर्वा घास और द्वादशी के दिन तुलसी के पत्तों को नहीं तोड़ना चाहिए। यदि कोई मनुष्य द्वादशी के दिन तुलसी-पत्र तोड़ता है, तो उसे अत्यंत गर्हित नरक की प्राप्ति होती है। एकादशी के दिन भी तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इसलिए तुलसी सेवा के लिए पत्तों का चयन हमेशा दशमी तिथि को ही कर लेना चाहिए। भगवान श्री हरि की भक्ति में एकादशी का व्रत करना मनुष्य को वैकुंठ धाम का अधिकारी बनाता है, क्योंकि गोविंद के चरणों में पूर्ण निष्ठा ही इस व्रत का एकमात्र उद्देश्य है। जिस घर में एकादशी का पालन होता है, वहाँ स्वयं श्रीहरि का वास होता है। ✨🌺 ॐ नमो नारायणाय 🌺✨ 🚩 श्रीहरि की भक्ति ही जीवन का परम कल्याण है। 🚩

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