
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
4 days ago
इसमें एक ही पंक्ति में पूरी गीता का सार लिख दिया है। > *"तुम्हारे कर्मों से ही तुम्हारा परिचय है, नाम तो वैसे बहुतों का राम कृष्ण है।"* इसका विस्तार से अर्थ समझते हैं — 1. चित्र में दो रूप क्यों हैं? ऊपर एक तरफ *बांसुरी वाले कृष्ण* हैं और दूसरी तरफ *धनुष वाले राम* हैं। दोनों एक ही तत्व हैं — विष्णु — पर दोनों का *परिचय उनके कर्मों से* बना। - राम ने कर्म किया — *मर्यादा का*। पिता के वचन के लिए राज छोड़ दिया, 14 साल वन गए। इसलिए वो _मर्यादा पुरुषोत्तम_ कहलाए। - कृष्ण ने कर्म किया — *लीला और धर्म स्थापना का*। गीता सुनाई, अधर्म को खत्म किया। इसलिए वो _लीलाधर और जगदगुरु_ कहलाए। नाम दोनों का भगवान है, पर पूजा उनके कर्मों की होती है। 2. नाम तो बहुतों का राम-कृष्ण है — इसका गहरा अर्थ आज गली-गली में हजारों लोग हैं जिनका नाम राम है, कृष्ण है, श्याम है। आधार कार्ड पर नाम लिखने से कोई राम नहीं बन जाता। *आपका असली नाम आपका कर्म है।* - दुनिया आपको आपके नाम से नहीं, आपके काम से याद रखती है। - आपका नाम पुकारने से कोई नहीं आएगा, लेकिन आपका अच्छा कर्म लोगों के दिल में हमेशा रहेगा। - रावण का असली नाम दशानन था, पर कर्मों से वो अहंकारी कहलाया। शबरी का नाम किसी ने नहीं पूछा, पर कर्मों से वो भक्तमाता बन गई। तुलसीदास जी ने भी यही लिखा है — *कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।* 3. हमारे जीवन में इसका क्या मतलब है? हम अक्सर सोचते हैं — लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मेरा नाम खराब हो जाएगा। पर सच ये है — - *नाम से नहीं, नियत से पहचान बनती है।* - आप ऑफिस में क्या काम करते हैं, घर में बड़ों से कैसे बोलते हैं, अकेले में क्या सोचते हैं — यही आपका असली परिचय है। - आप चाहे कितना भी बड़ा नाम लगा लो, अगर कर्म छोटे हैं तो लोग भूल जाएंगे। और अगर कर्म बड़े हैं तो नाम खुद बड़ा हो जाएगा। इसलिए चित्र के नीचे कलम-दवात बनी है — जैसे कह रही हो कि रोज़ तुम्हारी जीवन की किताब में तुम्हारे कर्मों से ही तुम्हारा इतिहास लिखा जा रहा है। *सार ये है —* नाम माता-पिता देते हैं, पर *पहचान खुद बनानी पड़ती है।* और वो पहचान सिर्फ एक ही चीज से बनती है — तुम्हारे कर्म से। अच्छा कर्म करो, क्योंकि अंत में तुम्हारा नाम नहीं, तुम्हारा कर्म ही अमर रहेगा। *॥ जय श्री राम-कृष्ण ॥*

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