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आज सोमवार, 30 मार्च 2026 (चैत्र शुक्ल द्वादशी) के पावन अवसर पर, श्रीमद्भगवद्गीता के 13वें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) का 22वां श्लोक जीवन के एक गहरे सत्य को उजागर करता है। यह श्लोक बताता है कि जीवात्मा इस भौतिक संसार में सुख-दुःख का अनुभव क्यों करती है और उसके बार-बार जन्म लेने का कारण क्या है। श्लोक एवं अर्थ > पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। > कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ २२॥ > भावार्थ: प्रकृति में स्थित होकर ही यह पुरुष (जीवात्मा) प्रकृति से उत्पन्न गुणों (सत्त्व, रज और तम) को भोगता है। इन गुणों का संग (आसक्ति) ही इस जीवात्मा के अच्छी और बुरी योनियों में जन्म लेने का मुख्य कारण है। प्रमुख बिंदु और व्याख्या इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य की स्थिति और उसके कर्म-चक्र को बड़ी स्पष्टता से समझाया है: * प्रकृति और पुरुष का संबंध: जैसे बिजली बल्ब के संपर्क में आकर प्रकाश देती है, वैसे ही चेतन आत्मा जब जड़ प्रकृति (शरीर और इंद्रियों) के संपर्क में आती है, तो वह संसार के विषयों का अनुभव करने लगती है। * आसक्ति (Attachment) का परिणाम: जीवात्मा स्वयं निर्लिप्त है, लेकिन जब वह प्रकृति के गुणों (सुख, मोह, लोभ) से खुद को जोड़ लेती है, तो वह उनके अधीन हो जाती है। * जन्म-मरण का चक्र: हमारी जैसी आसक्ति या 'संग' होता है, वैसी ही हमारी गति होती है। * सत्त्व गुण का संग उच्च योनियों (देव, ऋषि) की ओर ले जाता है। * रज गुण मनुष्य योनि में उलझाए रखता है। * तम गुण नीच योनियों (पशु-पक्षी आदि) का कारण बनता है। आज के लिए सुविचार इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमारी उन्नति या अवनति बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि हम किन विचारों और गुणों के साथ जुड़ते हैं। यदि हम गुणों से ऊपर उठकर परमात्मा में स्थित होने का प्रयास करें, तो हम इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकते हैं। "स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि एक शुद्ध आत्मा मानकर कर्म करना ही सच्ची स्वतंत्रता है।"

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