MyMandirInstall

लालच बुरिबला है यह कहावत सदियों से हमें यह समझाती आ रही है कि अति सर्वत्र वर्जयेत् (अति हर चीज़ की बुरी होती है), खासकर जब बात इच्छाओं की हो। लालच असल में एक ऐसा जाल है जिसमें इंसान अपनी खुशियाँ और शांति दोनों गँवा देता है। यहाँ इसके कुछ मुख्य कारण दिए गए हैं कि आखिर इसे 'बुरी बला' क्यों कहा जाता है: लालच के दुष्प्रभाव * असंतोष की भावना: लालची व्यक्ति के पास कितना भी हो, उसे हमेशा कम ही लगता है। वह 'जो है' उसका आनंद लेने के बजाय 'जो नहीं है' उसके पीछे भागता रहता है। * विवेक का खोना: जब इंसान के मन पर लालच हावी होता है, तो वह सही और गलत का अंतर भूल जाता है। * रिश्तों में दरार: अक्सर धन या पद का लालच अपनों के बीच कड़वाहट पैदा कर देता है। * नैतिक पतन: लालच ही वह बीज है जिससे चोरी, बेईमानी और भ्रष्टाचार जैसे अपराध जन्म लेते हैं। एक छोटी सी सीख इसे हम उस शिकारी और सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कहानी से समझ सकते हैं। शिकारी ने रोज़ एक अंडा मिलने के बजाय, एक ही बार में सारे अंडे निकालने के लालच में मुर्गी को ही मार डाला। परिणाम? उसके हाथ से वह रोज़ का एक अंडा भी चला गया। > "संतोषम् परमं सुखम्" > अर्थात, संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। जो हमारे पास है, उसमें खुश रहना और ईमानदारी से आगे बढ़ना ही असली सफलता है। >

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!