MyMandirInstall

नियम तोड़ने पर इस मंदिर में जा सकती है आँखों की रोशनी 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भारत के एक कोने में ऐसा मंदिर जरूर बना है जहां की मान्यता के अनुसार यदि आप मंदिर परिसर में कुछ विशेष नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो आपकी आंखों की रोशनी चली जाएगी। सुनने में यह बेहद अटपटा लगता है, लेकिन यह सत्य है। बांके बिहारी मंदिर मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण का ‘बांके बिहारी मंदिर’ एक ऐसा मंदिर है जहां नियमों का उल्लंघन करना आपको भारी पड़ सकता है। यह कोई कहानी नहीं है, वरन् सच्चाई है जिसका सुबूत हर उस इंसान के पास है जिसने यह सज़ा झेली है। लेकिन ऐसा क्यों होता है यह हम आपको जरूर बताएंगे। साथ ही इस मंदिर से जुड़ी अन्य रहस्यमयी बातों से भी पर्दा उठाएंगे... श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें मानव रूपी अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित बांके बिहारी मंदिर की मथुरा में बेहद मान्यता है। केवल मथुरा ही क्यों, इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का पावन आशीर्वाद पाने के लिए दूर-दूर से और यहां तक कि विदेश से भी भक्त आते हैं। श्रीकृष्ण का बचपन श्रीकृष्ण का बचपन और उनका लालन-पोषण मथुरा में ही हुआ। मथुरा की गलियों में ही उन्होंने अपनी चमत्कृत लीलाओं से खुशियों का रस भरा। श्रीकृष्ण की याद में बना यह मंदिर उनके नाम से ही प्रसिद्ध है ‘श्री बांके बिहारी मंदिर’। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण को बांके बिहारी क्यों कहा जाता है? बांके बिहारी इसके पीछे कोई राज़ नहीं, वरन् कृष्णजी की रोचक लीलाओं का ही असर है। उनके नटखट अंदाज़ ने ही उन्हें श्री बांके बिहारी का नाम दिया है। दरअसल ‘बांके’ शब्द का अर्थ होता है तीन जगह से मुड़ा हुआ और बिहारी का अर्थ होता है- श्रेष्ठ उपभोक्ता। आम भाषा में बिहारी शब्द का संबंध उससे किया जा सकता है जो जीवन का श्रेष्ठतम आनंद जानता हो। क्यों कहते हैं बांके बिहारी? और कुछ ऐसे ही थे श्रीकृष्ण... उनके लिए जीवन एक आनंद था। और जो उनके हिसाब से आनंद शब्द का अर्थ जान ले, उसका जीवन सफल माना जाता है। कहते हैं श्री बांके बिहारी मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति त्रिभंग आवस्था में खड़ी है। इस मूर्ति से संबंधित कई ऐसे रोचक तथ्य है जो हैरान कर देने के लिए काफी हैं। स्वामी हरिदास जी👉 मथुरा स्थित बांके बिहारी मंदिर को आदरणीय स्वामी हरिदास जी द्वारा स्थापित किया गया था। यदि आप इस बात से अनजान हैं तो आपको बता दें कि स्वामी हरिदास जी प्राचीन काल के मशहूर गायक तानसेन के गुरु थे। इसलिए उन्होंने स्वयं श्रीकृष्ण पर निधिवन में ऐसे कई गीत गाए जो आज भी बेहद प्रसिद्ध हैं। श्रीकृष्ण की दी हुई मूर्ति स्वामी जी और मंदिर के भीतर स्थापित मूर्ति की जो कहानी है यदि आप वह जानेंगे तो दंग रह जाएंगे। कहते हैं स्वामी जी ने स्वयं निधिवन में श्रीकृष्ण का स्मरण कर इस मूर्ति को अपने सामने पाया था। इस तरह आए थे राधा-कृष्ण “प्रथम हूं हुती अब हूं आगे हूं रही है न तरिहहिं जैसें अंग अंग कि उजराई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसें श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी सम वस् वैसें”... इस पंक्ति को स्माप्त करते हुए जैसे ही स्वामी जी ने आंखें खोली तो उनके सामने राधा-कृष्ण स्वयं प्रकट हुए। स्वामी जी ने किया निवेदन उन्हें देखकर स्वामी जी और उनके साथ उपस्थित भक्तों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। स्वामी जी के निवेदन अनुसार राधा कृष्ण की वह छाया एक हो गई और एक मूर्ति का आकार लेकर वहां प्रकट हो गई। आज यही मूर्ति बांके बिहारी मंदिर में सदियों से स्थापित है। काले रंग की मूरत यह वही मूर्ति है जो स्वयं राधा-कृष्ण द्वारा स्वामी जी को प्रदान दी गई। राधा-कृष्ण अपने भव्य अवतार में उनके सामने प्रकट तो हुए लेकिन जाते-जाते छोड़ गए अपनी एक मूरत, काले रंग की सुंदर-सी कृष्णजी की मूरत! श्री आशुधीर इस मूरत को स्वामी जी ने काफी सहेज कर रखा और बाद में मंदिर में स्थापित कराया। स्वामी जी का जन्म राधा अष्टमी के दिन श्री आशुधीर और उनकी पत्नी श्रामति गंगादेवी के यहां 1535 बिक्रमी को हुआ था। उनका जन्म एक छोटे से गांव में हुआ था जो आज के समय में हरिदासपुर के नाम से जाना जाता है। यह गांव आज अलीगढ़, उत्तर प्रदेश में स्थित है। क्यों आए थे राधा-कृष्ण? लेकिन आखिरकार स्वामी हरिदास जी को ही हरि के रूप श्रीकृष्ण ने दर्शन क्यों दिए। इसके पीछे एक लंबी कहानी और इतिहास छिपा है... दरअसल स्वामी हरिदास जी के पूर्वजों का श्रीकृष्ण से एक गहरा नाता था। कहते हैं उनके एक पूर्वज श

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!