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1️⃣7️⃣❗0️⃣1️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣ *“आत्मज्ञान”* न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ आत्मा के लिये किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु। वह न तो जन्मा है न कभी जन्म लेता है और न कभी जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य, शाश्र्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता। गुणात्मक दृष्टि से, परमात्मा का अणु-अंश परम से अभिन्न है। वह शरीर की भाँति विकारी नहीं है। कभी-कभी आत्मा को स्थायी या कूटस्थ कहा जाता है। शरीर में छः प्रकार के रूपान्तर होते हैं। वह माता के गर्भ से जन्म लेता है, कुछ काल तक रहता है, बढ़ता है, कुछ परिणाम उत्पन्न करता है, धीरे-धीरे क्षीण होता है और अन्त में समाप्त हो जाता है। परन्तु आत्मा में ऐसे परिवर्तन नहीं होते। आत्मा अजन्मा है, किन्तु चूंकि ये भौतिक शरीर धारण करता है, अतः शरीर जन्म लेता है। आत्मा न तो जन्म लेता है, और न मरता है। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी होती है। चूंकि आत्मा जन्म नहीं लेता, अतः न तो उसका भूत है, न वर्तमान और न भविष्य है। वह नित्य, शाश्र्वत और सनातन है, अर्थात् उसके जन्म लेने का कोई इतिहास नहीं है। शरीर के प्रभाव में आकर आत्मा के जन्म मरण आदि का इतिहास खोजते हैं। आत्मा शरीर की तरह कभी वृद्ध नहीं होती, अतः तथाकथित वृद्ध पुरुष भी अपने में बाल्यकाल और युवावस्था जैसी अनुभूति पाता है। शरीर के परिवर्तनों का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं होता। शरीर की उपसृष्टि सन्तान हैं और वह भी व्यष्टि आत्माएँ हैं और शरीर के कारण वे किसी-न-किसी की सन्तानें प्रतीत होते हैं। शरीर की वृद्धि आत्मा की उपस्थिति के कारण होती है। किन्तु आत्मा की न तो कोई उपवृद्धि है और न ही उसमें कोई परिवर्तन होता है। अतः आत्मा शरीर के छः प्रकार के परिवर्तनों से मुक्त है। आत्मा ज्ञान से या चेतना से सदैव पूर्ण है। अतः चेतना ही आत्मा का लक्षण है। यदि कोई हृदयस्थ आत्मा को नहीं खोज पाया वह भी आत्मा की उपस्थिति को चेतना की उपस्थित से जान सकता है। कभी-कभी हम बादलों या अन्य कारणों से आकाश में सूर्य को नहीं देख पाते, किन्तु सूर्य का प्रकाश सदा विद्यमान रहता है अतः हमें विश्वास हो जाता है कि यह दिन का समय है। प्रातःकाल ज्यों ही आकाश में थोड़ा सा सूर्य का प्रकाश दिखता है हम समझ जाते हैं कि सूर्य आकाश में है। इसी प्रकार शरीरों में, चाहे पशु के हों या पुरूष के, कुछ-न-कुछ चेतना रहती है, अतः हम आत्मा की उपस्थिति को जान लेते हैं। किन्तु जीव की यह चेतनख परमेश्वर की चेतना से भिन्न है क्योंकि परम चेतना तो सर्वज्ञ है। भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञान से पूर्ण। व्यष्टि जीव की चेतना विस्मरणशील है। जब वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है, तो उसे कृष्ण के उपदेशों से शिक्षा तथा प्रकाश और बोध प्राप्त होता है। किन्तु कृष्ण विस्मरणशील जीव नहीं हैं। यदि वे ऐसे होते तो उनके द्वारा दिये गये भगवद्गीता के उपदेश व्यर्थ होते। आत्मा के दो प्रकार हैं, एक तो अणु-आत्मा और दूसरा विभु-आत्मा। "परमात्मा तथा अणु-आत्मा दोनों शरीर रूपी उसी वृक्ष में जीव के हृदय में विद्यमान हैं और इनमें से जो समस्त इच्छाओं तथा शौकों से मुक्त हो चूका है वही भगवत् कृपा से आत्मा की महिमा को समझ सकता है।" कृष्ण परमात्मा के भी उद्गम हैं और अर्जुन अणु-आत्मा के समान है जो अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है। अतः उसे कृष्ण द्वारा या उनके प्रमाणिक प्रतिनिधि गुरु द्वारा प्रबुद्ध किये जाने की आवश्यकता है..!! *🙏🏼🙏🏻🙏🏽जय श्री कृष्ण*🙏🙏🏿🙏🏾

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Comments (2)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

Jan 17, 2026

जय सिया राम जी 🙏🌟 शुभ दुपहर जी! ☀️🙏 आपको भगवान राम और माता सीता की कृपा और आशीर्वाद से सुंदर और सुखद दोपहर की शुभकामनाएं! 🌈💖। जय श्री राधे कृष्णा जी 🙏💫 आपके दिन को भगवान राम और माता सीता की कृपा से मंगलमय और सुखद बनाएं! 🌟💕 जय श्री राम 🙏🌟 जय सिया राम 🙏💖

Radhe Radhe

Radhe Radhe

Jan 17, 2026

‼️गुड मॉर्निंग,राधे राधे जय श्री कृष्ण जी सुबह-सुबह की राधे राधे जी‼️