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एक समय देवता और असुर लगातार युद्ध कर रहे थे। असुरों की शक्ति बढ़ती जा रही थी और देवता कमजोर पड़ने लगे थे। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुँचे और सहायता माँगी। भगवान विष्णु ने कहा—“यदि समुद्र मंथन किया जाए, तो उससे अमृत निकलेगा। उस अमृत को पीकर देवता अमर और शक्तिशाली हो जाएँगे।”🚩 देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का निर्णय लिया। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकी नाग को रस्सी की तरह उपयोग किया गया। लेकिन जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण किया और विशाल कछुए के रूप में पर्वत को अपनी पीठ पर संभाल लिया।🚩 समुद्र मंथन से एक-एक करके अनेक दिव्य वस्तुएँ निकलीं—कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी माता, कौस्तुभ मणि, चंद्रमा और कई अन्य रत्न। लेकिन अचानक भयंकर विष “हलाहल” निकला। उसका प्रभाव इतना घातक था कि पूरा संसार संकट में पड़ गया।🚩 तब शिव ने संसार की रक्षा के लिए वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण उनका कंठ नीला पड़ गया और वे “नीलकंठ” कहलाए। अंततः समुद्र से दिव्य वैद्य धन्वंतरि प्रकट हुए। उनके हाथ में अमृत से भरा स्वर्ण कलश था। अमृत कलश को देखकर देवता और असुर दोनों लालच में आ गए। सभी उसे पाने के लिए संघर्ष करने लगे।🚩 तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। उनका रूप इतना आकर्षक था कि असुर मोहित हो गए। मोहिनी ने कहा—“मैं अमृत सभी में बराबर बाँट दूँगी।” असुर उनकी बात मान गए, लेकिन भगवान ने चतुराई से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया।🚩 एक असुर चुपके से देवताओं के बीच बैठकर अमृत पीने लगा। उसका नाम था राहु। लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु को बता दिया। तुरंत भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।🚩 क्योंकि उसने अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं, इसलिए वह मरा नहीं। उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया।🚩 कहा जाता है कि अमृत कलश की कुछ बूंदें पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरीं—प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। इन्हीं स्थानों पर आज भी कुंभ मेला आयोजित होता है। 🌟 कथा का सार — सहयोग से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं, लालच विनाश का कारण बनता है और भगवान हमेशा धर्म और सत्य की रक्षा करते हैं। 🙏 हर हर महादेव 🙏 जय श्रीहरि

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