
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
113 days ago
सैकड़ों साल पहले, तमिलनाडु के श्रीविल्लीपुत्तुर में विष्णुचित्त (जिन्हें पेरियालवार कहा जाता है) नाम के एक परम भक्त रहते थे। वे रोज़ भगवान विष्णु के लिए मालाएं पिरोते थे। एक सुबह जब वे अपने बगीचे में तुलसी के पौधों की सेवा कर रहे थे, तो उन्हें मिट्टी में एक नवजात कन्या मिली। संतानहीन विष्णुचित्त ने उसे भगवान का आशीर्वाद माना और उसका नाम रखा 'कोदई' (फूलों की माला)। कोदई जैसे-जैसे बड़ी हुई, उसका मन सांसारिक खेलों में नहीं, बल्कि भगवान रंगनाथ के प्रेम में रमने लगा। वह उनसे ठीक वैसे ही प्रेम करने लगी जैसे राधा कृष्ण से करती थीं। एक दिन कोदई के मन में एक विचार आया— "क्या मैं भगवान के लिए सुंदर लगूँगी?" उसने चुपके से वह माला उठाई जो उसके पिता ने भगवान के लिए बनाई थी, उसे अपने गले में डाला और आईने में अपना प्रतिबिंब देखने लगी। खुद को भगवान की वधू के रूप में देखकर वह मुस्कुरा दी। फिर उसने चुपचाप वह माला उतारकर वापस रख दी। यह सिलसिला हफ्तों तक चला। भगवान को वही माला चढ़ाई जाने लगी जिसे कोदई पहले पहन चुकी होती थी। एक दिन विष्णुचित्त ने कोदई को माला पहनते देख लिया। वे सिहर उठे! "बेटी! यह तुमने क्या किया? जूठी माला भगवान को अर्पण? यह तो महापाप है!" विष्णुचित्त ने उस दिन दूसरी माला बनाई और दुखी मन से भगवान से क्षमा मांगी। लेकिन उस रात मंदिर के द्वार नहीं खुले। स्वयं भगवान विष्णु ने विष्णुचित्त के स्वप्न में आकर कहा: "मुझे वही माला चाहिए जिसे कोदई ने पहना था। उसके प्रेम की खुशबू के बिना ये फूल मुझे निर्जीव लगते हैं।" विष्णुचित्त की आँखों से आँसू बह निकले। उन्हें समझ आ गया कि उनकी बेटी कोई साधारण बालिका नहीं, बल्कि साक्षात भक्ति का अवतार है। तब से कोदई का नाम 'आण्डाल' (वह जिसने प्रभु को जीत लिया) पड़ा। आण्डाल अब विवाह योग्य हो चुकी थी। जब पिता ने विवाह की बात की, तो आण्डाल ने दृढ़ता से कहा— "मैं केवल श्रीरंगम के राजा, रंगनाथस्वामी से ही विवाह करूँगी। किसी मनुष्य का वरण करना मेरे वश में नहीं।" सर्दियों के महीने में (मार्गशीर्ष), उन्होंने 'तिरुप्पावै' के 30 पदों की रचना की। वे हर सुबह सखियों के साथ यमुना के तट पर जाने का भाव करतीं और भगवान को जगाने के गीत गातीं। उनकी तड़प इतनी सच्ची थी कि स्वयं भगवान को धरती पर आना पड़ा। कहा जाता है कि भगवान रंगनाथ ने श्रीरंगम के पुजारियों और विष्णुचित्त को स्वप्न में आदेश दिया कि आण्डाल को दुल्हन के रूप में सजाकर मंदिर लाया जाए। हजारों की भीड़, शंखों की ध्वनि और मंगलगान के बीच, आण्डाल को पालकी में बिठाकर श्रीरंगम मंदिर लाया गया। जैसे ही आण्डाल ने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया, उनकी आंखों में एक अलौकिक चमक थी। वे धीरे-धीरे भगवान की मूर्ति की ओर बढ़ीं, चरणों को स्पर्श किया और देखते ही देखते एक दिव्य ज्योति में बदलकर मूर्ति में समा गईं। आज भी, श्रीविल्लीपुत्तुर के मंदिर में आण्डाल को साक्षात देवी माना जाता है। वहां की परंपरा के अनुसार, पहले माला आण्डाल की मूर्ति को पहनाई जाती है, और फिर वही माला उतारकर भगवान रंगनाथ (विष्णु) को चढ़ाई जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रेम जब अपनी पराकाष्ठा पर होता है, तो भगवान भी भक्त के आगे झुक जाते हैं। भक्ति में 'नियम' से बड़ा 'भाव' होता है। आण्डाल ने सिखाया कि ईश्वर को पाने के लिए दूर जाने की ज़रूरत नहीं, बस उन्हें अपना मान लेने की ज़रूरत है।

Comments (1)

सविता
May 9, 2026
Radhe radhe 🙏🌹
