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SHREE SHARMA

263 days ago

#महादेव_५ || देवताओंकी प्रार्थना तथा दक्षको क्षमा-दान || दक्षयज्ञमें रुद्रगणोंद्वारा पराजित किये जानेसे व्यथित मुनि और देवता ब्रह्माजीके पास गये। ब्रह्माजी भी अपने पुत्र दक्षका सिर यज्ञकुण्डमें भस्म होनेके कारण पुत्र शोकमें व्याकुल थे। तदनन्तर देवताओं और मुनियोंको साथ लेकर ब्रह्माजी भगवान् विष्णुके पास गये। ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे कहा— 'प्रभो ! भगवान् रुद्रके आदेशसे शिवगणोंने देवताओंका अङ्ग-भङ्ग कर दिया तथा दक्षका सिर यज्ञ-कुण्डमें भस्म करके उनके यज्ञको नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। देव ! जिस प्रकारसे यज्ञ पूर्ण हो, दक्ष तथा उनके ऋत्त्विक् जीवित हो जायँ और सारे मुनि एवं देवता सुखी हो जायँ — वैसा उपाय कीजिये। रमानाथ ! हम सभी लोग आपकी शरणमें आये हैं।' भगवान् विष्णुने कहा— 'विधाता ! समस्त देवता और मुनि भगवान् शिवके अपराधी हैं, क्योंकि इन लोगोंने उन्हें यज्ञका भाग नहीं दिया। अब तुम लोग शुद्ध हृदयसे शीघ्र प्रसन्न होनेवाले उन्हीं भगवान् महेश्वरको प्रसन्न करनेका यत्न करो। वे क्षणमात्रमें कुपित होकर सम्पूर्ण जगत्‌को नष्ट कर देते हैं। इस समय वे भगवान् महादेव अपनी प्राणवल्लभा सतीके वियोगसे दुःखी हैं। दुरात्मा दक्षने अपने दुर्वचनरूपी बाणोंसे उनके हृदयको पहले ही घायल कर दिया है। तुमलोग शीघ्र ही जाकर उनसे अपने अपराधोंके लिये क्षमा माँगो। भगवान् शङ्कर आशुतोष हैं। वे अपने जनोंद्वारा अपने प्रति किये गये अपराधका खयाल न कर उन्हें क्षमा कर देते हैं। मैं भी तुम लोगोंके साथ भगवान् शिवके निवासपर चलूँगा और तुम्हारे लिये उनसे क्षमा माँगूँगा।' तदनन्तर श्रीहरि सबको साथ लेकर भगवान् शिवके पवित्र धाम कैलास गये। कैलासपर परम रमणीय दिव्य वटवृक्षके नीचे सबने भगवान् शङ्करको विराजमान देखा। शिवभक्तिमें तत्पर रहनेवाले सनकादि ऋषि प्रसन्नतापूर्वक महेश्वरकी सेवामें बैठे हुए थे। भगवान् शिवका श्रीविग्रह परम शान्त दिखायी देता था। भस्म आदिसे उनके अङ्गोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। इस दिव्य रूपमें महेश्वरका दर्शन करके विष्णुसहित सभी देवताओंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति करते हुए वे कहने लगे— 'महेश्वर ! आप सम्पूर्ण सृष्टिके आदि कारण हैं ! आपके भयसे वायु चलती है, सूर्य तपते हैं तथा मृत्यु संहार करती है। हे परमेश्वर ! हमलोग अत्यन्त दुःखी एवं दीन होकर आपकी शरणमें आये हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये । आप शीघ्र कृपा करके दक्षके अपूर्ण यज्ञको पूर्णकर उसे जीवनदान दीजिये। भगकी आँखें, पूषाके दाँत, भृगुकी दाढ़ी-मूँछ तथा देवताओंके अङ्ग पूर्ववत् ठीक हो जायँ। हे नाथ! यज्ञकर्म पूर्ण होनेपर जो कुछ शेष रहे, वह सम्पूर्ण आपका भाग हो।' ऐसा कहते हुए देवता और मुनिगण महेश्वरके चरणोंमें दण्डके समान पड़ गये। महादेवजी प्रसन्न होकर बोले— 'दक्ष-यज्ञका विनाश मेरे द्वारा नहीं हुआ। दक्ष स्वयं दूसरोंसे द्वेष करता था। दूसरोंके प्रति किया गया बर्ताव ही अपने लिये फलित होता है। अतः ऐसा कर्म कभी नहीं करना चाहिये जो दूसरोंको कष्ट देता हो। दक्षका विनाश उसके अहंकारद्वारा हुआ है। दूसरोंके प्रति किया गया उसका द्वेष ही उसके संहारका कारण बना। मैं बालक समझकर उसके अपराधको क्षमा करता हूँ।' भगवान् शिवने ऐसा कहकर देवताओं और मुनियोंके अङ्ग ठीक कर दिये तथा दक्षके सिरकी जगह बकरेका सिर जोड़कर उसे जीवनदान दिया और दक्ष-यज्ञको सम्पन्न करा दिया। इस प्रकार भगवान् शिवका कोप भी करुणाका कारण बना। महेश्वरके संहारके पीछे भी उनकी दयाका असीम सागर लहराता रहता है। 🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿

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