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SHREE SHARMA

4 days ago

॥ श्री रुद्राय नमः ॥ ॥ रुद्र और उमा : अभिन्न शिव–शक्ति तत्त्व ॥ ॥ प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट । शैव उपनिषद्-परंपरा में रुद्रहृदयोपनिषद् भगवान् रुद्र और भगवती उमा के अभिन्न तत्त्व का अत्यंत सुंदर निरूपण करती है। यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध शैव उपनिषद् के रूप में परंपरा में प्रसिद्ध है। 🔸️ उपनिषद् में कहा गया है :— रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः। रुद्रो ब्रह्मा उमा वाणी तस्मै तस्यै नमो नमः॥ १७॥ रुद्रो विष्णुरुमा लक्ष्मीस्तस्मै तस्यै नमो नमः। रुद्रः सूर्य उमा छाया तस्मै तस्यै नमो नमः॥ १८–१९॥ रुद्रः सोम उमा तारा तस्मै तस्यै नमो नमः। रुद्रो दिवा उमा रात्रिस्तस्मै तस्यै नमो नमः॥ रुद्रो यज्ञ उमा वेदिस्तस्मै तस्यै नमो नमः। रुद्रो वह्निरुमा स्वाहा तस्मै तस्यै नमो नमः॥ २०॥ रुद्रो वेद उमा शास्तं तस्मै तस्यै नमो नमः। रुद्रो वृक्ष उमा वल्ली तस्मै तस्यै नमो नमः॥ रुद्रो गन्ध उमा पुष्पं तस्मै तस्यै नमो नमः। रुद्रोऽर्थ अक्षरः सोमा तस्मै तस्यै नमो नमः॥ रुद्रो लिङ्गमुमा पीठं तस्मै तस्यै नमो नमः॥ २१–२३॥ और इसके बाद उपनिषद् का अत्यंत महत्वपूर्ण वचन है— सर्वदेवात्मकं रुद्रं नमस्कुर्यात्पृथक्पृथक्। एभिर्मन्त्रपदैरेव नमस्यामीशपार्वतीम्॥ २४॥ 🔹️ भावार्थ :--- यहाँ रुद्र और उमा को दो स्वतंत्र, परस्पर पृथक् तत्त्वों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही परम तत्त्व की पुरुष और शक्ति अभिव्यक्तियों के रूप में समझाया गया है। रुद्र नर हैं तो उमा नारी हैं। रुद्र ब्रह्मा हैं तो उमा वाणी अर्थात् सरस्वती हैं। रुद्र विष्णु हैं तो उमा लक्ष्मी हैं। रुद्र सूर्य हैं तो उमा उनकी छाया हैं। रुद्र सोम हैं तो उमा तारा हैं। रुद्र दिन हैं तो उमा रात्रि हैं। रुद्र यज्ञ हैं तो उमा उसकी वेदी हैं। रुद्र अग्नि हैं तो उमा स्वाहा हैं। रुद्र वेद हैं तो उमा शास्त्र हैं। रुद्र वृक्ष हैं तो उमा लता हैं। रुद्र गन्ध हैं तो उमा पुष्प हैं। और रुद्र लिङ्ग हैं तो उमा पीठ हैं। अर्थात् :--- जहाँ शिव-तत्त्व है, वहाँ उसकी शक्ति भी अनिवार्य रूप से विद्यमान है। शक्ति के बिना शिव की अभिव्यक्ति नहीं और शिव के बिना शक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना गया है। इसीलिए यह उपासना केवल बाहरी स्त्री-पुरुष की उपमा नहीं है, बल्कि चैतन्य और उसकी शक्ति, आधार और उसकी अभिव्यक्ति, तत्त्व और उसकी क्रिया—इनकी अभिन्नता की ओर संकेत करती है। 🔸️ रुद्रहृदयोपनिषद् आगे कहती है :— सर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम्। सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम्॥ २६॥ अर्थात् वह परम तत्त्व समस्त का अधिष्ठान, अद्वन्द्व, सनातन और सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म है, जो वाणी और मन की सामान्य पहुँच से परे है। 🔸️ और अगले मन्त्र में कहा गया है :— तस्मिन्सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यादिदं शुक। तदात्मकत्वात्सर्वस्य तस्माद्भिन्नं नहि क्वचित्॥ २७॥ अर्थात् उस परम तत्त्व का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् उसी तत्त्व से अभिन्न है, उससे पृथक् कुछ भी नहीं है। ॥ शिव–शक्ति का संदेश ॥ इस उपनिषद् का संदेश यह है कि संसार में दिखाई देने वाले विभिन्न नाम, रूप, देवता, शक्तियाँ और पदार्थ अन्ततः उसी एक परम तत्त्व की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इसलिए शिव की उपासना करते हुए शक्ति का अनादर और शक्ति की उपासना करते हुए शिव का निषेध—दोनों ही इस तत्त्वदृष्टि के विपरीत हैं। शिव और शक्ति अभिन्न हैं। रुद्र और उमा अभिन्न हैं। तत्त्व और शक्ति अभिन्न हैं। यही भाव आगे चलकर अर्धनारीश्वर-तत्त्व में भी अत्यंत सुंदर रूप से प्रकट होता है। " अस्तु " ॥ श्री रुद्राय नमः, श्री उमामहेश्वराभ्यां नमः, श्री शिवशक्तये नमः ॥ स्रोत : रुद्रहृदयोपनिषद्, मन्त्र १७–२७।

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Comments (8)

Rahul Mishra

Rahul Mishra

Oct 19, 2026

जय पार्वती मां

Rahul Mishra

Rahul Mishra

Oct 19, 2026

ओम नमः शिवाय

Suman ✨

Suman ✨

Oct 18, 2026

Om namaha shivaya ji 🙏🌹🌺🌿

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Oct 18, 2026

शिव शक्ति 🙏🔱 जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति है, जहाँ शक्ति है, वहाँ संसार है। हर हर महादेव ❤️ जय माता पार्वती 🌺 ॐ नमः शिवाय 🔱 | हर हर महादेव 🙏

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Oct 18, 2026

🌹🌹 शुभ रविवार 🌹🌹 आप को दुर्गा अष्टमी (महाष्टमी) की हार्दिक शुभकामनाएं 🥀 जय मां महागौरी 🙏🙏🚩🚩