
SHREE SHARMA
47 days ago
प्रथम पंक्ति (बार बार प्रभु विनती करूँ, धरूँ चरण पर सीश): भक्त हनुमान जी के सम्मुख अत्यंत विनम्र होकर बार-बार प्रार्थना कर रहा है। वह अपने अहंकार को त्यागकर अपना शीश (सिर) प्रभु के पावन चरणों में रख रहा है। सनातन परंपरा में चरणों में सिर रखना पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है, जहाँ भक्त स्वयं को पूरी तरह ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है। द्वितीय पंक्ति (भक्ति दान मोहे दीजिये, हे कपीश जगदीश): यहाँ भक्त प्रभु से संसार की कोई भौतिक सुख-सुविधा, धन या वैभव नहीं मांग रहा है। वह केवल 'भक्ति रूपी दान' की याचना कर रहा है। भक्त कहता है कि हे 'कपीश' (वानरों के स्वामी/हनुमान जी) और हे 'जगदीश' (जगत के स्वामी, जो हनुमान जी के हृदय में बसने वाले श्री राम भी हैं और स्वयं रुद्र अवतार हनुमान जी भी हैं), मुझे अपनी निश्छल भक्ति का वरदान दीजिए ताकि मेरा मन सदा आपके चरणों में लगा रहे। विशेष: इस दोहे में 'दास्य भाव' की प्रधानता है, ठीक वैसी ही भक्ति जैसी स्वयं हनुमान जी महाराज श्री रामचंद्र जी के प्रति रखते हैं। भक्त यहाँ हनुमान जी को ही अपना सर्वस्व मानकर उनसे मोक्ष या संसार न मांगकर केवल उनकी सेवा और प्रेम मांग रहा है।

Comments (3)

Rama Devi Sahu
Jul 14, 2026
🙏🏹 Jai Shree Ram 🏹🙏

Rakesh chandra
Jul 14, 2026
जय श्री राम

Selvaraj T
Jul 14, 2026
🛕🛕🛕ஜெய் அனுமார் 🛕🛕
