MyMandirInstall

सृष्टि की नींव रखने के लिए भी महाविनाश की आवश्यकता होती है 🌍🌍 प्रलय के अनंत जल में, जब भगवान विष्णु शेषनाग पर निद्रालीन थे, तब महामाया ने उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नामक दो भयंकर असुरों को जन्म दिया। यह जानते हुए कि प्रलय के जल में डूबी हुई पृथ्वी अत्यंत कोमल हो गई है और जीवन का भार नहीं सह सकती, देवी ने एक घातक ब्रह्मांडीय माया रची। जलमग्न शिला पर विष्णु के साथ पांच हज़ार वर्षों तक चले भयंकर मल्ल-युद्ध के बाद, महामाया के भ्रम में अंधे होकर अहंकारवश दोनों असुरों ने स्वयं भगवान को ही वरदान मांगने को कह दिया उनके इसी अहंकार को हथियार बनाकर विष्णु ने उनकी मृत्यु मांग ली। जब असुरों ने यह शर्त रखी कि उनका वध केवल वहीं हो जहां बिल्कुल जल न हो, तब भगवान विष्णु ने अपना विराट रूप धारण किया और दोनों के सिर अपनी विशाल जांघों पर रखकर उन्हें धड़ से अलग कर दिया। उनके वध के पश्चात, उनके शरीर से निकली अपार चर्बी (मेद) को पृथ्वी की गीली मिट्टी में मिलाया गया, जिससे धरती ठोस और जीवन के अनुकूल हो गई। इसी 'मेद' के कारण इस पृथ्वी का शाश्वत नाम 'मेदिनी' पड़ा इस आदिकालीन महाविनाश से कालिका पुराण त्रिपुरा की अत्यंत रहस्यमयी तांत्रिक उपासना की ओर मुड़ता है। देवी त्रिपुरा का तीन अद्भुत स्वरूपों में ध्यान किया जाता है। पहले रूप में वे नग्नावस्था में पांच प्रेतों के आसन पर प्रत्यालिढ़ (धनुर्धारी) मुद्रा में खड़ी होकर पुष्प-धनुष धारण करती हैं। दूसरे रूप में वे कमल-शय्या पर बैठी श्वेत कांति वाली हैं, जिनके गले में नरमुंडों की माला है। और तीसरा, सर्वोच्च मिलन का रूप-जपाकुसुम (गुड़हल) के समान रक्त वर्णी, नग्न और खुले केशों वाली देवी, जो रक्त पान करती हुई सीधे भगवान सदाशिव की छाती पर विराजमान हैं, जो उनके नीचे एक हंसते हुए शव के रूप में लेटे हैं

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!