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*एक बार की बात है।* *भक्त कुम्भनदास जी प्रतिदिन की तरह श्रीनाथजी के दर्शन के लिए मंदिर पहुँचे। उस दिन उन्होंने देखा कि श्रीनाथजी कुछ उदास से बैठे हैं—मुख लटका हुआ, मानो मन में कोई बात अटकी हो।* *कुम्भनदास जी ने प्रेमपूर्वक पूछा—* *“प्रभु! आज क्या बात है? ऐसे मुँह फुलाए क्यों बैठे हैं?”* *श्रीनाथजी मुस्कुराकर बोले—* *“क्या बताऊँ कुम्भनदास… आज तो माखन खाने का मन बहुत कर रहा है।”* *कुम्भनदास जी बोले—* *“तो प्रभु, बताइए माखन कहाँ से लाएँ?”* *श्रीनाथजी ने कहा—* *“देखो कुम्भनदास, एक गोपी है जो रोज़ मेरे दर्शन को आती है और कहती है—‘प्रभु, मुझे अपनी गोपी बना लो।’ आज उसी के घर चलेंगे।”* *यह सुनकर कुम्भनदास जी थोड़े घबरा गए—* *“प्रभु! कोई देख लेगा तो?”* *श्रीनाथजी हँसते हुए बोले—* *“अरे नहीं! आज उसके घर शादी है। सब बरात में गए हैं। घर में केवल गोपियाँ ही हैं। हम चुपके से जाएँगे, माखन खाएँगे और लौट आएँगे—किसी को पता भी नहीं चलेगा।”* *कुम्भनदास जी बोले—* *“ठीक है प्रभु… पर मैं बूढ़ा हूँ और आप हट्टे-कट्टे। अगर कुछ हुआ तो मुझे छोड़कर मत भाग जाना।”* *श्रीनाथजी बोले—* *“पक्की बात! साथ-साथ भागेंगे। पहले माखन, फिर वापसी।”* *दोनों धीरे-धीरे उस गोपी के घर पहुँचे। पीछे एक छोटी-सी दीवार थी। योजना बनी कि दीवार फाँदकर भीतर जाना है।* *श्रीनाथजी बोले—* *“कुम्भन, तुम लंबे हो, पहले मुझे ऊपर चढ़ाओ।”* *कुम्भनदास जी ने प्रभु को ऊपर चढ़ा दिया। फिर श्रीनाथजी ने हाथ बढ़ाकर कुम्भनदास जी को भी ऊपर खींच लिया। दोनों भीतर पहुँच गए।* *घर में घुसते ही मटकी से माखन निकाला गया। श्रीनाथजी स्वयं खाते और कुम्भनदास जी को भी खिलाते। कुम्भनदास जी की मूँछों और मुँह पर माखन लग गया।* *तभी श्रीनाथजी की दृष्टि एक बूढ़ी मइया पर पड़ी, जो खाट पर लेटी थी। उसकी आँखें आधी खुली थीं और एक हाथ फैला हुआ था।* *श्रीनाथजी बोले—* *“कुम्भन! यह मइया माखन माँग रही है। थोड़ा सा इसे भी दे देते हैं।”* *कुम्भनदास जी घबरा गए—* *“प्रभु! न मरवाइए… अगर जग गई तो लेने के देने पड़ जाएँगे।”* *पर श्रीनाथजी कहाँ मानने वाले थे। वे मइया के हाथ पर माखन रख आए। माखन ठंडा था। उसके स्पर्श होते ही बूढ़ी मइया की आँख खुल गई और वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी—* *“चोर! चोर! अरे कोई आओ… घर में चोर घुस आया!”* *आवाज़ सुनते ही घर की गोपियाँ दौड़ पड़ीं। इधर श्रीनाथजी फुर्ती से दीवार कूदकर निकल गए। कुम्भनदास जी भी पीछे-पीछे चढ़े, पर वृद्ध होने के कारण आधे ही चढ़ पाए। एक गोपी ने उन्हें पकड़ लिया। अँधेरे में चोर समझकर उन्हें खूब पीटा। फिर दीया जलाया गया।* *जैसे ही उजाला हुआ, सब चौंक गईं—* *“अरे! यह तो कुम्भनदास बाबा हैं!”* *एक गोपी बोली—* *“बाबा! आप रात में हमारे घर क्या कर रहे थे? और यह माखन आपके मुँह पर?”* *फिर वह हँसते हुए बोली—* *“आप कह देते, हम खुद माखन पहुँचा देते। इतना कष्ट क्यों किया?”* *कुम्भनदास जी चुप रहे।* *गोपी ने फिर कहा—* *“बाबा, आप अकेले तो नहीं आए होंगे। यह दीवार आप अकेले पार नहीं कर सकते।”* *तब कुम्भनदास जी बोले—* *“अरी गोपी! क्या बताऊँ… श्रीनाथजी के मन में तेरे घर का माखन आ गया। वही मुझे यहाँ ले आए। अब खुद तो भाग गए और मुझे पिटवा दिया।”* *यह सुनकर गोपी आनंद से भर गई। वह बोली—* *“आज तो मेरे भाग्य जाग गए! स्वयं श्रीनाथजी मेरे घर माखन खाने आए।”* *श्यामसुंदर की जय।*

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Comments (2)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

Jan 29, 2026

jai shree krishna ji 🙏 ✨

Radhe Radhe

Radhe Radhe

Jan 28, 2026

‼️शुभ दोपहर बुधवार राधे कृष्णा राधे राधे जी‼️