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**👑 कलयुग के राजा-रानी - DAY 2** **राजा जनमेजय: पिता के अपमान और मौत का वह प्रतिशोध, जिसने पाताल तक को हिला दिया!** महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठे अर्जुन के प्रपौत्र (परपोते) और राजा परीक्षित के पुत्र—**महाराज जनमेजय**। कलयुग की शुरुआत का वह सबसे खौफनाक अध्याय, जहां एक बेटे के क्रोध ने पूरी सृष्टि में हाहाकार मचा दिया था। ### 🔥 बदले की वह खौफनाक चिंगारी राजा परीक्षित को एक ऋषि के शाप के कारण तक्षक नाग ने छल से डस लिया था। पिता की इस क्रूर मृत्यु की खबर जब युवा राजा जनमेजय को मिली, तो उनका खून खौल उठा। उन्होंने कोई साधारण युद्ध नहीं चुना, बल्कि रचा इतिहास का सबसे भयानक अनुष्ठान—**'सर्प सत्र यज्ञ'**। ### 🌪️ जब आसमान से बरसने लगे नाग हस्तिनापुर की वेदियों से ऋषियों के अचूक मंत्र गूंजने लगे। यज्ञ कुंड की लपटें आसमान छूने लगीं। मंत्रों की शक्ति ऐसी थी कि दुनिया के कोने-कोने से, जंगलों, गुफाओं और पाताल से खिंचे चले आते हुए लाखों-करोड़ों सर्प सीधे उस धधकती अग्नि में समाने लगे। नागलोक में कोहराम मच गया। पूरा नागवंश समाप्ति की कगार पर आ खड़ा हुआ। ### ⚡ देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोल उठा मुख्य अपराधी **तक्षक नाग** अपनी जान बचाने के लिए स्वर्ग लोक भागा और देवराज इंद्र के सिंहासन से लिपट गया। जब ऋषियों को यह पता चला, तो उन्होंने आहुति का संकल्प बदला: > *"इंद्राय तक्षकाय स्वाहा!"* (यदि तक्षक इंद्र के साथ है, तो इंद्र समेत अग्नि में समा जाए!) > मंत्रों के प्रचंड खिंचाव से देवराज इंद्र का सिंहासन स्वर्ग से खिंचकर सीधे यज्ञ कुंड की ओर गिरने लगा। समस्त देवता थर-थर कांपने लगे। ### 🛑 कैसे थमा यह महाविनाश? जब लगा कि आज सृष्टि का संतुलन हमेशा के लिए बिगड़ जाएगा, तब बीच में आए युवा ऋषि **आस्तीक मुनि** (माता मनसा देवी के पुत्र)। उन्होंने अपने ज्ञान, तर्कों और धर्मनीति से राजा जनमेजय को समझाया कि प्रतिशोध की कोई सीमा नहीं होती और एक के अपराध की सजा पूरी जाति को नहीं दी जा सकती। जनमेजय ने ऋषि के वचनों का मान रखते हुए महायज्ञ को वहीं रोक दिया और बचे हुए नागों को जीवनदान मिला। जिस दिन यह महाविनाश थमा, वह दिन था **नागपंचमी**। > **सार:** जनमेजय का यह यज्ञ केवल बदले की कहानी नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि सत्ता और संकल्प जब क्रोध के साथ मिलते हैं, तो देवलोक भी थर्रा उठता है—परंतु अंततः धर्म और विवेक ही विनाश को रोकते हैं। >

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