
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
107 days ago
संत श्यामदासजी, जो सदैव 'श्रीराम' नाम के अजपाजाप में लीन रहते थे, एक बार रात के समय घने जंगल में मार्ग भटक गए। वहाँ उनका सामना प्रेतों की एक टोली और उनके राजा से हुआ। प्रेतराज ने संत को बताया कि वे एक उत्सव मना रहे हैं क्योंकि अगले दिन एक दुराचारी सेठ पुत्र की मृत्यु होने वाली है, जो प्रेत बनकर उनकी पुत्री से विवाह करेगा। दयावश महात्माजी उस गाँव पहुँचे और मरणासन्न सेठ पुत्र (सांकलचंद) को अंतिम समय में राम नाम जपने की प्रेरणा दी। सांकलचंद ने पश्चाताप के साथ प्रभु का नाम लिया और देह त्याग दी। अगली रात जब संत पुनः उसी वन में पहुँचे, तो वहाँ उत्सव की जगह मातम छाया था। प्रेतराज ने हताश होकर बताया कि संत के प्रभाव से सेठ पुत्र ने अंत समय में 'राम' नाम ले लिया, जिससे वह प्रेतयोनि में आने के बजाय मुक्त हो गया। प्रेत के मुख से राम नाम की ऐसी महिमा सुनकर संत भाव-विभोर हो गए। मुख्य संदेश अंतिम मति सो गति: अंत समय में लिया गया भगवान का नाम जीव को अधोगति (प्रेतयोनि) से बचाकर सद्गति प्रदान करता है। नाम की शक्ति: राम नाम में महापापों को नष्ट करने और नरक से उद्धार करने की अमोघ शक्ति है। निर्भयता: ईश्वर का सच्चा भक्त मृत्यु और प्रेत आदि से कभी भयभीत नहीं होता। राधे राधे

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