
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
107 days ago
एक बार शंकर भगवान पार्वती जी और नारद जी के साथ पृथ्वी पर घूमने आये और एक गांव में पहुँचे। उस दिन चैत्र शुक्ल की तीज थी। जैसे ही गाँव वालो को भगवान के आने की सूचना मिली तो धनवान स्त्रियां श्रृंगार में तथा आवभगत के लिए तरह तरह के भोजन बनाने में व्यस्त हो गयी। कुछ गरीब परिवार की महिलाएं जैसी थी वैसी ही थाली में हल्दी , चावल और जल आदि लेकर आ गयी और शिव पार्वती की भक्ति भाव से पूजा करने लगी। माता पार्वती उनकी पूजा से प्रसन्न हुयी और उन सबके उपर सुहाग रूपी हरिद्रा ( हल्दी ) छिड़क दी। इस प्रकार माँ पार्वती का आशीवार्द व मंगल कामनाए पाकर अपने अपने घर चली गयी। कुछ देर बाद अमीर औरते भी सोलह श्रृंगार कर , छप्पन भोग सोने के थाल में सजाकर आ गयी। तब भगवान शंकर ने पार्वती जी को कहा कि सारा आशीवार्द तो तुमने पहले ही उन स्त्रियों को दे दिया अब इनको क्या दोगी ? पार्वती जी ने कहा आप उनकी बात छोड़ दें। उन्हें ऊपरी पदार्थो से निर्मित रस दिया है इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा परन्तु इन लोगो को मैं अपनी अंगुली चीरकर रक्त सुहाग रस दूंगी जो मेरे समान ही सौभाग्यशाली बन जायेगी। जब कुलीन स्त्रियां शिव पार्वती की पूजा कर चुकी तब माँ पार्वती ने अपनी अंगुली चीर कर उन पर रक्त छिड़क कर अखण्ड सौभाग्य का वर दिया। इसके बाद पार्वती जी शिव जी को कहा मै नदी मै नहाकर आती हूँ। माँ पार्वती ने नदी के किनारे जाकर बालू से शिव लिंग बनाया और आराधना करने लगी। शिव जी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि आज के दिन जो भी स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेंगी उनके पति चिरंजीव रहेंगे और अंत में उन्हें मोक्ष मिलेगा। इसके बाद पार्वती जी वहाँ गयी जहाँ शिव जी व नारद को छोड़कर गयी थी। शिव जी ने देर से आने कारण पूछा तो पार्वती जी ने बहाना बनाया और कहा कि नदी के किनारे मेरे भाई भाभी मिल गए थे। उन्होंने दूध भात खाने का आग्रह किया , इसीलिए देरी हो गई। शिव जी बोले हम भी दूध भात खाएंगे और जंगल की तरफ चल दिए पार्वती जी ने सोचा पोल खुल जाएगी वह प्रार्थना करती हुई पीछे पीछे चल दी। जंगल में पहुँचने पर देखा सुंदर माया का महल बना हुआ था उसमें पार्वती जी के भाई और भाभी विद्यमान थे। भाई भाभी ने उन सबका स्वागत सत्कार किया और आवभगत की और वहां रुकने का आग्रह किया। तीनो ने आतिथ्य स्वीकार किया। तीन दिन वहाँ रुके फिर वहां से रवाना हो गए। तीनों चलते चलते काफी दूर तक आ गए। शाम होने पर शिव जी पार्वती जी से बोले कि मैं अपनी माला तो तुम्हारे मायके ही भूल आया हूँ। पार्वती जी ने कहा कि मैं लेकर आती है और माला लेने जाने लगी। शिव जी बोले इस वक्त तुम्हारा जाना ठीक नहीं है। उन्होंने नारद जी को माला लेने भेज दिया। नारद जी वहाँ पहुंचे तो देखा कि वहाँ कुछ नहीं था। महल का तो नामो निशान भी नहीं था। अँधेरे में जंगली जानवर घूम रहे थे अंधकार पूर्ण वातावरण डरावना लग रहा था। यह देख कर नारद जी आश्चर्य में पड़ गए। तभी बिजली कड़की और माला उन्हें एक पेड़ पर टंगी दिखाई दी। माला लेकर नारद जी तुरन्त वहाँ से दौड़ते हुए शिव जी के पास पहुंचे और शिव जी को वहाँ का वर्णन सुनाया। सुनकर शिवजी हँसने लगे और उन्होंने नारद जी को बताया कि पार्वती जी अपनी पार्थिव पूजा की बात गुप्त रखना चाहती थी , इसीलिए झूठा बहाना बनाया था और फिर असत्य को सत्य करने के लिए उन्होंने अपनी पतिधर्म की शक्ति से माया महल रचा था। सच्चाई बताने के लिए ही मैने तुम्हे वहाँ माला लेने भेजा था। यह जानकर नारद जी माँ पार्वती की पतिव्रता शक्ति से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने माँ पार्वती की बहुत प्रसंशा की और पूजा करने की बात छिपाने को भी सही ठहराया क्योंकि पूजा-पाठ गुप्त रूप से पर्दे में रहकर ही करने चाहिए। उन्होंने खुश होकर कहा कि जो स्त्रियां इस दिन गुप्त रूप से पूजन कार्य करेगी उनकी सब मनोकामना पूरी होगी और उनका सुहाग अमर रहेगा। चूँकि पार्वती जी ने व्रत छिपकर किया था अतः उसी परम्परा के अनुसार आज भी इस दिन पूजा के अवसर पर पुरुष उपस्थित नहीं रहते हैं। खरी की खोटी अधूरी की पूरी !!! जय शिव शंकर ! जय माँ पार्वती !

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