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शीतला माता की पूजा और बासौड़ा (बसौड़ा) पर्व उत्तर भारत में विशेष महत्व रखता है। यह पर्व होली के ठीक आठ दिन बाद, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व से जुड़ी कुछ खास बातें और परंपराएं नीचे दी गई हैं: 1. "बासी" भोजन का महत्व इस त्योहार का नाम 'बसौड़ा' इसलिए है क्योंकि इसमें बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। * परंपरा के अनुसार, इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। * भोजन एक दिन पहले (सप्तमी की रात) ही बना लिया जाता है। इसमें मुख्य रूप से मीठे चावल (गुड़ वाले), पूड़ी, राबड़ी, दही और हलवा शामिल होता है। 2. शीतला माता का स्वरूप माता शीतला को स्वच्छता और आरोग्य की देवी माना जाता है। उनके स्वरूप में कुछ प्रतीक बहुत महत्वपूर्ण हैं: * हाथ में झाड़ू: यह स्वच्छता का प्रतीक है। * कलश: इसमें शीतल जल होता है, जो शीतलता प्रदान करता है। * नीम के पत्ते: यह संक्रमण रोकने की शक्ति का प्रतीक है। 3. पर्व के पीछे वैज्ञानिक तर्क बसौड़ा का समय ऋतु परिवर्तन (सर्दियों की विदाई और गर्मियों की शुरुआत) का होता है। * पुराने समय में, गर्मियों के दौरान होने वाली बीमारियाँ जैसे चेचक (Chickenpox/Smallpox) को 'माता' कहा जाता था। * शीतला माता की पूजा का उद्देश्य शरीर को शीतल रखना और स्वच्छता के माध्यम से इन संक्रमणों से बचना था। * इस दिन के बाद से ही आमतौर पर बासी भोजन खाना बंद कर दिया जाता है, क्योंकि गर्मी बढ़ने के कारण भोजन जल्दी खराब होने लगता है। 4. पूजा विधि * महिलाएं सुबह जल्दी उठकर ठंडे जल से स्नान करती हैं। * माता के मंदिर जाकर या घर के निश्चित स्थान पर बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। * पूजा के बाद घर के सभी सदस्य प्रसाद के रूप में वही बासी भोजन

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