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. "नन्दोत्सव की लीला" श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गयी और वसुदेव की बेडियाँ खुल गयी थी। तब वसुदेव श्रीकृष्ण को गोकुल में नन्दराय के यहाँ छोड़ मैया यशोदा की बगल में सुला और कन्या को लेकर मथुरा लौट गये। इधर सबसे पहले सुनन्दा बुआ को पता चला, और जाकर देखा कि यशोदा भाभी की बगल में तो एक सुन्दर साँवला सा लाला खेल रहा है, तो सुनन्दा बुआ तो खुशी के मारे उछल पडीं और दौडी-दौडी नन्द बाबा के पास गयीं और बोलीं---नन्दराय जी आपके घर लाला का जन्म हुआ है फिर तो नन्द बाबा की खुशी का ठिकाना न रहा। और दौडे- दौडे बाबा यमुना स्नान करने गये। यमुना स्नान कर बाबा ने नये वस्त्र बगलबन्दी-धोती पहन, दुपट्टा कंधे पै डारि, बाल काढि,चंदन इत्र लगा, मूछन में ताव देकैं, सिर पै पगडी बाधि, एक ग्वाल से बोले! लइयो छोरा दर्पन अब बता में कैसो लगि रह्यो हूॅ ? वो बोले ! बाबा सही बताऊँ आज तौ बिल्कुलऊ नाय लगि रहे अस्सी साल के से! ऎसे लगि रहे हौ जैसें सोलह साल के से छोरा। इसके बाद स्वस्ति वाचन, जातकर्म संस्कार, देवता, ब्राह्मण, पूजा, दान, गौदान आदि सब हुआ, तिल के सात पर्वत दान किये। फिर तौ बाबा ने खूब धन सम्पत्ति लुटाई। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा लाईक करें और अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। धीरे-धीरे यह बात सारे गोकुल में फैल गयी। गोपी ग्वाल सब बाबा को बधाई देने लगे। बाबा ने तो चाँदी के खजाने खोल दिये, सोने, हीरे-जवाहरात आदि सब अपनी अपनी मनचाही वस्तु बाबा से लेने लग गये। बाबा ने ब्राह्मनों को गाय दान में दी। देंन चहै करतार जिन्हें सुख, सोतौ प्रवीन टरै नहि टारे। उद्यम पौरुष किये बिना,धन आवत है बिन हाथ पसारे॥ देव कहैं सब आपस में बिधि के परपंच न जात है टारे। बेटा भयौ वसुदेव के धाम, दुन्दभि बाजत नन्द के द्वारे॥ अब तौ सब गोपी-ग्वाल नाच-गान के साथ बधाई गाने लगे। नन्द के आनन्द भयौ, जय कन्हैयालाल की॥ जय कन्हैयालाल की, जसुदा गोपाल की॥ हाथी दीन्हेे घोडा दीन्हे, और दीन्हीं पालकी॥ ज्वानन कूं लड्डू पेडा, बूढेन कूं लापसी॥ मोती दीन्हे मूंगा दीन्हे, गैया ब्याही हाल की॥ नन्द के आनन्द भयौ जय कन्हैयालाल .... ... इसके बाद फिर तौ दही-माखन की होली होने लगी, सब गोपी ग्वाल एक-दूसरे को माखन के लौदा फेकने लगे। दूर से खडी एक नब्बे साल की बूढी मैया जिसके मुँह में एक भी दांत नहीं था, यह सब देख रही थी। जिसका मुँह थोडा सा खुला हुआ, एक ग्वाल की नजर पडी उसने बूढी मैया के मुँह की तरफ जोर से माखन का लौदां फेका जो मैया के सीधे मुँह से होकर झट से मैया के पेट में चला गया। अब तो बाबा ने भी सब ग्वाल-वालों के साथ नाच-गान में सम्मलित हो खूब आनन्द लिया। आज बर्फी सी ब्रजनारी बनी, गुझिया से गीत और माखन से ग्वाला॥ पेडा से प्यारे बने बलदेव जी, रसखीर सी रोहिणी रूप रसाला॥ नन्द महीप बने नमकीन, गोकुल गोप सब गरम मसाला॥ जायो जसोदा जलेबी सी रानी ने, आज रबड़ी सी रात में लडुआ सों लाला॥ पूत सपूत जन्यो जसुदा, इतनो सुन के वसुधा सब दौडी॥ देवन के आनंद भयो, पुनि धावत गावत मंगल गौरी॥ नन्द कछु इतनो जो दियो, कि इन्द्र कुबेरहू कि मति बौरी॥ देखत मोहि लुटाये दियो, नवजी बछिया छछियान पिछौरी॥ सबसे पहले बाबा के बडे भाई सनन्द बाबा जो (खदिरवन खायरे में रहते थे) ने नन्द बाबा को लाला भये की कुर्ता-टोपी भेंट की। आज भी नन्दगांव मे नन्दोत्सव के दिन गोस्वामी समाज द्वारा यह पद अवश्य गाया जाता है। 'खायरे ते आवैगौ,कुर्ता-टोपी लाबैगौ' आइये हम और आप सब नन्दोत्सव का आनन्द लें- ब्रज में है रही जयजयकार,नन्द घर लाला जायौ है। ब्रज चौरासी कोस में भैया, सबकी धन्य यशोदा मैया। अस्सी बरस की आयु में सुत ऎसौ जायौ है॥ नन्द यशोदा भाग्य बढाई, सबही देने लगे बधाई। ऎसौ अदभुद सुत तौ काहू, और न पायगा है॥ ब्रज में है रही जय..............। क्या आनन्द आ रहा होगा उस समय अहा हा हा हा। तनिक ह्रदय में विचार तो करो प्यारे ! धन्य हैं वो सब गोपी-ग्वाल जब इन सब गोपी ग्वालो ने इस आनन्द का साक्षात्कार किया होगा। इससे ज्यादा और क्या कहूँ मेरी तुच्छ बुद्धि इससे ज्यादा इस आनन्द का बखान नहीं कर सकती। इस दुर्लभ आनंद को मन में संजोए, और नन्दोत्सव की हार्दिक बधाइयाँ बाँटें। ० ० ० ॥जय जय श्री राधे॥ ********************************************

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