
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
176 days ago
आचार्य अभिनवगुप्त स्वामिपाद के द्वारा विरचित अत्यन्त प्रसिद्ध देवीप्रशस्तिपरक पद्यद्वय। प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य चैनल। तव च का किल न स्तुतिरम्बिके सकलशब्दमयी किल ते तनुः । निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो मनसिजासु बहि:प्रसरासु च ॥ इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे जगति जातमयत्नवशादिदम् । स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन कालाकलास्ति मे ॥ ‘हे जगदम्बिके! संसार में ऐसा कौन-सा वाङ्मय है, जो तुम्हारी स्तुति नहीं है; क्योंकि तुम्हारा शरीर तो सकल शब्दमय है। हे देवि! अब मेरे मन में संकल्प-विकल्पात्मक-रूप से उदित होने वाली एवं संसार में दृश्यरूप से सामने आने वाली सम्पूर्ण आकृतियों में आपके स्वरूप का दर्शन होने लगा है। हे समस्त अमंगलध्वंसकारिणि कल्याणस्वरूपे शिवे! इस बात को सोचकर, अब बिना किसी प्रयत्न के ही सम्पूर्ण चराचर जगत् में, मेरी यह स्थिति हो गई है कि मेरे समय का क्षुद्रतम अंश भी तुम्हारी स्तुति, जप, पूजा अथवा ध्यान से रहित नहीं है (अर्थात् मेरे सम्पूर्ण जागतिक आचार-व्यवहार, तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न रूपों के प्रति यथोचितरूप से व्यवहृत होने के कारण, तुम्हारी पूजा के रूप में परिणत हो गए हैं)।

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