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कर्ण का कवच-कुंडल दान और इन्द्र का शक्ति-दान महाभारत का यह प्रसंग दान, त्याग और वचन-पालन का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। इसी कारण कर्ण को आज भी "दानवीर कर्ण" के नाम से स्मरण किया जाता है। कर्ण, सूर्यदेव और माता कुंती के पुत्र थे। उनके जन्म के समय ही भगवान सूर्य ने उन्हें दिव्य कवच और कुंडल प्रदान किए थे। ये साधारण आभूषण नहीं थे, बल्कि दिव्य रक्षा-कवच थे। जब तक वे उनके शरीर पर रहते, कोई भी योद्धा उन्हें युद्ध में पराजित नहीं कर सकता था। महाभारत युद्ध निकट था। देवराज इन्द्र जानते थे कि उनका पुत्र अर्जुन और कर्ण आमने-सामने अवश्य आएँगे। उन्हें भय था कि दिव्य कवच-कुंडल के रहते अर्जुन कर्ण को कभी नहीं हरा पाएँगे। इसलिए उन्होंने कर्ण से उनका कवच-कुंडल प्राप्त करने का निश्चय किया। उधर सूर्यदेव ने स्वप्न में प्रकट होकर कर्ण को सावधान किया और कहा— «"पुत्र! इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके तुमसे तुम्हारा कवच और कुंडल माँगेंगे। उन्हें मत देना, क्योंकि यही तुम्हारी सबसे बड़ी रक्षा है।"» कर्ण ने विनम्रता से उत्तर दिया— «"यदि कोई याचक मेरे द्वार से खाली लौट जाए, तो मेरा दानवीर होना व्यर्थ है। मैं अपने वचन से कभी पीछे नहीं हटूँगा।"» कर्ण का नियम था कि वे प्रतिदिन सूर्य-पूजा के बाद किसी भी याचक को निराश नहीं लौटाते थे। एक दिन देवराज इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास पहुँचे। उन्होंने दान में वही दिव्य कवच और कुंडल माँग लिए। कर्ण समझ गए कि यह साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं देवराज इन्द्र हैं। फिर भी उन्होंने बिना किसी संकोच के अपना वचन निभाया। उन्होंने अपने शरीर से जुड़े हुए कवच और कुंडल को स्वयं काटकर निकाल लिया। शरीर से रक्त बहने लगा, असहनीय पीड़ा हुई, फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने दोनों हाथों से वह दिव्य कवच-कुंडल इन्द्र को दान कर दिए। कर्ण की अतुलनीय दानशीलता देखकर देवराज इन्द्र अत्यंत लज्जित और भाव-विभोर हो गए। उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर कहा— «"हे कर्ण! तुम्हारे समान दानी संसार में कोई नहीं। मैं तुम्हारे त्याग से अत्यंत प्रसन्न हूँ।"» इसके बाद इन्द्र ने कर्ण को अपनी अमोघ वासवी शक्ति (एकाघ्नी शक्ति) प्रदान की। उन्होंने कहा— «"यह दिव्य अस्त्र कभी निष्फल नहीं होगा, पर इसका प्रयोग केवल एक बार ही किया जा सकता है। जिस पर यह छोड़ा जाएगा, उसका वध निश्चित होगा।"» कर्ण ने कृतज्ञतापूर्वक वह शक्ति स्वीकार कर ली। महाभारत के युद्ध में जब घटोत्कच अपनी मायावी शक्तियों से कौरव सेना का भारी विनाश करने लगे, तब दुर्योधन की रक्षा के लिए कर्ण को विवश होकर उसी वासवी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। घटोत्कच का वध तो हो गया, लेकिन कर्ण के पास अर्जुन के विरुद्ध उपयोग करने के लिए वह अमोघ अस्त्र नहीं बचा। इस प्रकार कर्ण ने अपने जीवन में दान, वचन और धर्म को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व दिया। उनका यह त्याग आज भी भारतीय संस्कृति में दानवीरता की सर्वोच्च मिसाल माना जाता है। ।। जय श्री कृष्णा ।। ~~~~~~~~~~

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