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परम पूज्य प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज अपनी वाणी में इस बात पर बहुत जोर देते हैं। वे अक्सर कहते हैं कि जो अपनी भजन-साधना और आध्यात्मिक अनुभवों को जगजाहिर कर देता है, उसकी आध्यात्मिक पूंजी 'खर्च' हो जाती है। महाराज जी के अनुसार, भजन और नाम-जप को गुप्त रखने के कुछ मुख्य सूत्र यहाँ दिए गए हैं: १. "भजन को छिपाओ, पाप को बताओ" महाराज जी का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है कि इंसान को अपने पापों को भगवान या गुरु के सामने स्वीकार कर लेना चाहिए (ताकि वे धुल सकें), लेकिन अपने भजन (पुण्य) को तिजोरी की तरह बंद रखना चाहिए। यदि आप बता देंगे कि "मैं रोज १०८ माला करता हूँ," तो उस भजन का फल उस प्रशंसा में ही समाप्त हो जाएगा जो सामने वाला व्यक्ति आपकी करेगा। २. लोक-एषणा (प्रसिद्धि की भूख) से बचाव जब हम बताते हैं कि हम क्या जप करते हैं, तो मन में सूक्ष्म रूप से यह इच्छा जागती है कि लोग हमें "भक्त" समझें। महाराज जी कहते हैं कि यह 'लोक-एषणा' भक्ति के लिए जहर के समान है। प्रभु की कृपा उस पर बरसती है जो संसार की नजरों में साधारण बना रहता है, लेकिन भीतर से प्रभु से जुड़ा रहता है। ३. नाम-जप और गोपी भाव वे अक्सर 'राधा नाम' की महिमा गाते हुए कहते हैं कि जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने प्रेम को गुप्त रखती है, वैसे ही एक भक्त को अपने इष्ट के प्रति अपने प्रेम और जप को गुप्त रखना चाहिए। साधना जितनी गोपनीय होगी, उतनी ही प्रगाढ़ और गहरी होती जाएगी। ४. कृपा का रुकना महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि प्रभु की कृपा रुकती नहीं है, लेकिन अनुभव की जो गहराई मिलनी चाहिए, वह रुक जाती है। जब हम अपनी साधना का प्रदर्शन करते हैं, तो हमारा चित्त 'अंतर्मुखी' (भीतर की ओर) होने के बजाय 'बहिर्मुखी' (बाहर की ओर) हो जाता है। महाराज जी की एक विशेष बात: > "साधना ऐसी हो कि बगल में बैठे व्यक्ति को भी पता न चले कि आपके भीतर क्या चल रहा है। होंठ न हिलें, माला झोली के भीतर हो, और मन निरंतर नाम में लगा रहे।" >

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