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Rama Devi Sahu

431 days ago

🙏🌹 Jai Jagannath Swami Nayan Path Gami Bhavatu Me 🙏🌹 Dt.24.06.2025 (Tuesday) *********************************** ⛳🙏 भगवान जगन्नाथजी के वृंदावन आगमन की सत्य कथा !⛳ 💐 🌹🌻🌷🌼🌺🌹🌻🌷🌼🌺🌹🌻 💐 आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व की बात है | श्री वृंदावन में यमुना तट पर फरीदकोट ( पंजाब) के एक वैष्णव भक्त हरिदासजी भजन करते थे | उन्हें आलौकिक प्रेम प्राप्त था और अपने प्राणाधार के दर्शनों की प्रबल उत्कंठावश वे सोते - जागते , उठते - बैठते विरह अश्रु बहाते रहते थे | निरंतर कीर्तन , भगवत् प्रार्थना और स्मरण से अपने ह्रदय में उठे विरह और दीनता के सागर मेम हरिदासजी डूब गए | दीनवत्सल , प्रेमसिन्धु ,करूणावरूणालय भगवान भी भक्त का विरह नहीं सह सके और प्रकट हो गए | महात्माजी निर्निमेष नेत्रों से उनका दर्शन करने लगे | जब भगवान ने अपने रूपरस की माधुरी के पान में निमग्न हरिदासजी को चेत कराया तो उन्होंने अपना मस्तक भगवान के चरणों पर रख दिया | श्री भगवान अमृतसिक्त मधुर वाणी में बोले - " तुम जगन्नाथपुरी जाओ | इस वर्ष आषाढ़ में विग्रह परिवर्तन होगा | प्रथम विग्रह तुम ले आओ और इसी स्थल पर वृंदावन में स्थापित करो | मैं सब प्रकार से तुम्हारी रक्षा करूँगा |" भगवान की आग्यानुसार , सुयोग्य शिष्यों को लेकर कीर्तन करते हुए महात्माजी जगन्नाथ पुरी की ओर चल दिए और चार महीनों में वहाँ पहुँच गए | पुरी में रथयात्रा महोत्सव और विग्रह परिवर्तन योग था | प्रत्येक 36 वर्ष पश्चात् जब एक वर्ष में दो आषाढ़ आते है, तब जगन्नाथजी के कलेवर - विग्रह बदले जाते हैं | महा महोत्सव में पुरी पहुँचे भक्त हरिदासजी ने महाराज प्रतापरूद्र को भगवान की आग्या सुनाई | तब राजा ने कहा कि उन्हें तो भगवान की ऐसी कोई आज्ञा नहीं हुई है , अतः उन्होंने समुद्र में विग्रह प्रवाहित की जाने की प्राचीन परम्परा को तोड़ने में असमर्थता जताई | तब हरिदासजी अन्न - जल त्यागकर समुद्र तट पर एकाग्रचित्त से भगवान की उसी छवी का ध्यान करने लगे जिसके दर्शन उन्होंने वृंदावन में किए थे | अर्धरात्रि के समय राजा प्रतापरूद्र के स्वप्न में प्रकट होकर जगन्नाथजी ने क्रोधितभाव -भंगिमा युक्त मेघ सी गंभीर वाणी में कहा - " वे साधु मेरी आग्या से ही आए हैं | तुम भक्तों का तिरस्कार करते हो | जाओ उनसे क्षमा माँगो और उनकी आज्ञा का पालन करो | अब से मेरा प्रथम विग्रह वृंदावन में रहेगा |" राजा ने भक्त हरिदासजी को जगन्नाथजी , बलदेवजी , सुभद्राजी और सुदर्शन चक्र जी के विग्रहों के साथ एक विशाल रथ में सेना सहित वृंदावन भेज दिया | वृंदावन पहुँचकर अपनी भजन स्थली पर ही सुरभ्य मंदिर बनवाकर हरिदासजी ने विग्रहों की स्थापना की | वही सुंदर मंदिर , वही दिव्य विग्रह , वही दिव्य स्थान आज भी यमुना जी के तट पर स्थित है | इसे ' जगन्नाथ घाट ' कहा जाता है | आज भी यहाँ अपूर्व दिव्यता , आध्यात्मिक स्पंदन और शांति का सामराज्य सा छाया हुआ है | यहाँ भजन में स्वाभाविक मनलगता है | जगन्नाथ मंदिर का जीर्णोंद्धार गोलोकवासी स्वामी श्री ईश्वरपुरी जी महाराज के द्वारा कराया गया है | 🙏💐🌹 जय जगन्नाथ देव जी 🌹💐🙏 🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹

Comments (4)

Haresh Chanchlani Chanchlani

Haresh Chanchlani Chanchlani

Jun 26, 2025

राधे राधे जी 🌹🙏🌹

Haresh Chanchlani Chanchlani

Haresh Chanchlani Chanchlani

Jun 26, 2025

जय श्री कृष्णा जी

SHREE SHARMA

SHREE SHARMA

Jun 24, 2025

🙏🙏🙏🙏

Deepak  karki

Deepak karki

Jun 24, 2025

🙏🌹जय श्री कृष्णा राधे राधे शुभ रात्री 🙏🌹