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🛕꧁ जय द्वारकाधीश꧂🛕 श्री माँ शारदा देवी केवल साधु-संतों की ही माँ नहीं थीं, बल्कि वे पापी, अपराधी और समाज द्वारा बहिष्कृत लोगों की भी उतनी ही ममतामयी माँ थीं। यह घटना उनके गाँव, जयरामबाटी की है। उस समय समाज में छुआछूत और जाति-पाति के कड़े नियम थे। गाँव में अमजद नाम का एक मुस्लिम व्यक्ति था, जिसे लोग 'डाकू' या अपराधी मानकर उससे दूर रहते थे। समाज की नज़रों में वह अछूत और बुरा व्यक्ति था। एक दिन माँ ने अमजद को अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया। माँ ने बड़े प्रेम से उसे घर के बरामदे में बिठाया। जब भोजन परोसने की बारी आई, तो माँ की भतीजी (नलिनी) दूर से ही डरते और झिझकते हुए अमजद की थाली में खाना 'फेंकने' लगी, ताकि उसे छूना न पड़े। यह देखकर माँ को बहुत पीड़ा हुई। उन्होंने नलिनी को रोका और कहा: "अगर तुम इस तरह अनादर से भोजन दोगी, तो वह खाएगा कैसे?" माँ शारदा ने स्वयं आगे बढ़कर बड़े प्रेम से अमजद को भोजन परोसा। जब अमजद खाना खा चुका, तो माँ ने खुद झुककर उसके जूठे बर्तन साफ किए और उस स्थान को धोया। यह देखकर नलिनी चिल्ला उठी, "ओ माँ! आप यह क्या कर रही हैं? आपका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! वह एक अपराधी और दूसरी जाति का है।" तब माँ शारदा ने शांत भाव से वह ऐतिहासिक शब्द कहे जो आज भी मानवता की मिसाल हैं: "नलिनी, याद रखना, जैसे मेरा 'शरत' (स्वामी सारदानंद) मेरा बेटा है, वैसे ही यह 'अमजद' भी मेरा ही बेटा है।" कहानी का सार यह प्रसंग हमें सिखाता है कि आध्यात्मिकता का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि हर जीव में ईश्वर को देखना है। माँ के लिए कोई पराया नहीं था; उनके प्रेम की सीमा में अपराधी और संत दोनों समान थे। वे सिखाती थीं कि "यदि तुम शांति चाहते हो, तो दूसरों के दोष मत देखो। दुनिया को अपना बनाना सीखो।" *🔱शिव.शिव.शिव.शिव.शिव.li 🔱* 🔱शिव.शिव.शिव.शिव.li 🔱 *🔱शिव.शिव.शिव.li 🔱*

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