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*राम मंदिर ट्रस्ट ने दान में मिली सभी 2800 वस्तुओं को दिखा दिया!!* *अब तो चुल्लू भर पानी में डूब मरो*! अयोध्या में ट्रस्ट की बैठक के बाद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविन्द देव गिरी ने राममंदिर के दान में मिली ज्वैलरी, स्वर्ण रामचरितमानस, चरणपादुकाऐं और कागभुशिन्डी मीडिया के सामने रखी है. यह साबित किया गया कि, सारा माल सुरक्षित है । जिन चीज़ों के चोरी होने की बात कही गई थी, वो मीटिंग के बाद प्रेस के लिए डिस्प्ले में रखी गईं । इनमें सोने की रामचरितमानस, चांदी के कागभुशुंडी, चरणपादुका और हार शामिल हैं. रामद्रोही अफवाह उड़ा रहे हैं.* हमारे संस्कार में है, *"दाहिने हाथ से दान ऐसे करो कि बायें हाथ को पता न चले!!"* मगर यहां दान कर्ताओं के संशय (जो निराधार था) ने राजनीति करने वालों को आहार दे दिया!! छी! अब क्या करोगे? एक तो दान चोरी के मामले को हल्का किया क्योंकि यह अपने आप में महा पाप और विश्वासघात है!! दूसरे राजनीति खेले! अखिलेश यादव को विशेष रूप से यह मामला बैक फायर करेगा 2027 में!!SS रख लीजिए!! लानत!! *रिटायर्ड गृह सचिव की धूर्तता और चालबाजी .* जब कोई व्यक्ति बिना पक्के बिल या हॉलमार्क सर्टिफिकेट के "5 करोड़ की सोने की रामायण" दान करने का दावा करता है और फिर उसकी आधिकारिक मूल्य वाली रसीद (Official Receipt) के लिए दबाव बनाता है, *तो इसके पीछे का वित्तीय खेल साफ नजर आने लगता है।* रामायण मूल रूप से मोटे कागजों पर लिखी गई थी, जिसके सिर्फ बॉर्डर्स पर सोने के पतले पत्तर (Foil) चिपकाए गए थे। *लेकिन बाहर संदेश यह दिया गया कि यह "पूरी तरह सोने से निर्मित" रामायण है।* पहली बार चंपत राय जी द्वारा कमियां पकड़े जाने और फटकार लगाने के बावजूद, उन्होंने अपनी रणनीति नहीं बदली। वे बार-बार उसी अधूरे उत्पाद को लेकर पहुंचते रहे ताकि दबाव बनाकर इसे स्वीकार कराया जा सके। ₹5 करोड़ की रसीद मांगने के *पीछे की धूर्तता साफ है।* यदि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बिना किसी टैक्स ट्रेल (Tax Trail) या वैध दस्तावेज के, उन्हें ₹5 करोड़ का मूल्य अंकित करके आधिकारिक रसीद दे देता, *तो वह रसीद एक वैध कानूनी दस्तावेज बन जाती।* *उनकी अघोषित संपत्ति (या ब्लैक मनी) को एक झटके में 'लीगल डोनेशन' का सुरक्षा कवच मिल जाता।* इस रसीद का उपयोग आयकर विभाग (Income Tax) के सामने अपनी किसी भी अघोषित आय या संपत्ति को 'वैध डोनेशन' के रूप में दिखाकर क्लीन चिट पाने के लिए किया जा सकता था। चूंकि सोना "मां के पुराने गहने पिघलाकर" बनाने की बात कही गई, जिसका कोई आधिकारिक खरीद बिल या सोर्स (Source of Wealth) नहीं था, *इसलिए वह तकनीकी और कानूनी रूप से 'अघोषित' श्रेणी में आता है।* अगर ट्रस्ट इसके बदले 5 करोड़ की रसीद जारी करता, तो वह अनजाने में इस अघोषित संपत्ति को 'व्हाइट' करने का जरिया बन जाता। चंपत राय जी और ट्रस्ट के वित्तीय सलाहकारों ने यहीं पर अपनी सूझबूझ दिखाई। उन्होंने आस्था का सम्मान करते हुए रामायण को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन रसीद न देकर उसके व्यावसायिक मूल्य (Commercial Value) को प्रमाणित करने से साफ मना कर दिया। अधिकारी महोदय ने सोचा होगा कि , *रामलला के दरबार में 'फाइल' भी पास हो जाएगी और 'लक्ष्मी' भी साफ हो जाएगी,* लेकिन वे भूल गए कि ट्रस्ट की ऑडिटिंग व्यवस्था उनके प्रशासनिक अनुभवों से कहीं ज्यादा सख्त है। चाहे उस रिटायर्ड अधिकारी की मंशा वाकई अपनी अघोषित संपत्ति को ठिकाने लगाने की रही हो, या फिर टैक्स बेनिफिट लेने की—ट्रस्ट की सख्त और पारदर्शी नियमावली ने उनके इस प्रशासनिक 'मास्टरस्ट्रोक' को पूरी तरह से फेल कर दिया। *भगवान का दरबार आपकी अघोषित संपत्तियों को वैध बनाने का 'लॉन्ड्री हब' नहीं है।* यहाँ आपकी हैसियत चाहे जो रही हो, व्यवस्था नियमों, पारदर्शिता और सच्ची निष्ठा से ही है

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