
SHREE SHARMA
240 days ago
#बोधकथा || पहले मनके बोझ हटाओ || एक चोर एक सन्तके पास जाया करता था और रोज ही उनसे ईश्वर-दर्शनका उपाय पूछा करता था। महात्माजी कभी अवसर आनेपर बतानेकी बात कहकर उसे टाल दिया करते थे। एक दिन चोरने बहुत आग्रह किया तो महात्माजीने पहाड़की ऊँची चोटीकी ओर इशारा करते हुए कहा, 'तुम वहाँतक मेरे साथ छः पत्थर सिरपर रखकर चल सको, तो वहाँ पहुँचकर मैं तुम्हें उपाय बता सकता हूँ।' चोर तैयार हो गया। सन्तजीने छः पत्थर उसके सिरपर रख दिये और पीछे-पीछे चले आनेका इशारा करके वे आगे चलने लगे। कुछ ही दूर चला कि चोर हाँफने लगा, उसने महात्माजीसे कहा— 'भगवन् ! बोझा बहुत है। इतने भारको लेकर मैं आगे नहीं चल सकता।' सन्तने एक पत्थर उतार दिया। चोर चलने लगा, पर कुछ दूर जाकर वह फिर लड़खड़ाने लगा। एक पत्थर और उतारना पड़ा। यही क्रम आगे भी चला। कुछ दूर चलनेपर चोर थक गया और सन्तजीको एक पत्थर और उतारना पड़ा। अन्तमें सभी पत्थर उतार देने पड़े, तब कहीं वह चोटीतक साथ चल सकनेमें सफल हो सका। चोटीपर पहुँचकर सन्तने कहा— 'भाई ! जिस प्रकार तुम छः पत्थर रखकर चोटीतक पहुँच सकनेमें समर्थ न हुए, उसी प्रकार जीव काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सररूपी छः मनोविकारोंका भार ढोता हुआ ईश्वर-दर्शनमें सफल नहीं हो सकता। यदि ईश्वरतक पहुँचना हो, तो मनोविकारोंके पत्थर उतार फेंकने ही पड़ेंगे, इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं।'

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