
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
336 days ago
कॉपी पेस्ट #धूमावती वे महाप्रलय के समय मौज़ूद रहती हैं. उनका रंग महाप्रलय के बादलों जैसा है. जब ब्रह्मांड की उम्र ख़त्म हो जाती है, काल ख़त्म हो जाता है और स्वयं महाकाल शिव भी अंतर्ध्यान हो जाते हैं, माँ धूमावती अकेली खड़ी रहती हैं और काल तथा अंतरिक्ष से परे काल की शक्ति को जताती हैं. उस समय न तो धरती, न ही सूरज, चाँद , सितारे रहते हैं. रहता है सिर्फ़ धुआँ और राख- वही चरम ज्ञान है, निराकार न अच्छा न बुरा न शुद्ध न अशुद्ध न शुभ, न अशुभ धुएँ के रूप में अकेली माँ धूमावती. वे अकेली रह जाती हैं, सभी उनका साथ छोड़ जाते हैं. इसलिए अल्प जानकारी रखने वाले लोग उन्हें अशुभ घोषित करते हैं। यही उनका रहस्य है. वे दरअसल वास्तविकता को जताती हैं जो कड़वी,रूखी और इसलिए अशुभ लगती हैं. लेकिन वहीं से अध्यात्मिक ज्ञान जागता है जो हमें मोक्ष दिलाता है. माँ धूमावती अपने साधक को सारे सांसारिक बंधनों से आज़ाद करती हैं. सांसारिक मोह -माया से विरक्ति दिलाती हैं. यही विरक्त भाव उनके साधकों को अन्य लोगों से अलग-थलग और एकांतवास करने को प्रेरित करता है। हिंदू धर्म में इसे अध्यात्मिक खोज की चरम स्थिति कहा जाता है. सन्यासी लोग परम संतुष्ट जीव होते हैं-जो भी मिला खा लिया, पहन लिया, जहाँ भी ठहरने को मिला, ठहर लिये. तभी तो धूमावती धुएँ के रूप में हैं-हमेशा अस्थिर, गतिशील और बेचैन. उनका साधक भी बेचैन रहता है। उन्हें अशुभ माना जाता है क्योंकि बहुधा सच वह नही होता, जैसा कि हम चाहते हैं. वस्तुत: हम एक काल्पनिक संसार में जीते हैं, जिसमें सारी चीज़ें सारी बातें, सारी घटनायें हमारे मनमाफ़िक होती हैं. जब वैसा नही होता, हम दुखी हो जाते हैं क्योंकि हमारे लिए सब कुछ अच्छा हो एक मायालोक रचता है, जो हमें काम, क्रोध, मद, लोभ और ईर्ष्या के पाश में बाँध देता है. माँ धूमावती बड़े बेदर्दी और रूखेपन से उन पाशों को फाड़ देती हैं और साधक अकेला रहना पसंद करने लगता है वे तांत्रिक जो धूमावती का रहस्यवाद नही समझते शादीशुदा लोगों के लिए धूमावती-साधना करने से मना करते हैं सधवाओं को भी मना करते हैं। किंतु वे भूल जाते हैं कि धूमावती सहस्रनाम में यह भी कहा गया है कि वे महिलाओं के बीच निवास करती हैं और संतान प्राप्ति कराती हैं . इसका क्या तात्पर्य है वास्तव में वे सहज-सुलभ महाविद्या हैं. बच्चे की प्रसूति से लेकर मनुष्य की मृत्यु तक सिर्फ़ वही खड़ी रहती हैं. उनकी मूर्ति में भी उन्हें हमेशा वरदान देने की मुद्रा में दिखाया जाता है. हालाँकि. उनके चेहरे पर उदासी छायी रहती है वे महाविद्या तो हैं लेकिन उनका व्यवहार गाँव-टोले की दादी माँ जैसा है-सभी के लिए मातृत्व से लबालब यानी उनका अशुभत्व शुभ की ओर बदलाव का संकेत है. उनके बारे में दो कहानियाँ प्रचलित हैं. आइये, उनके आलोक में हम उनके दैविक व्यक्तित्व की जानकारी लें! पहली कहानी तो यह है कि जब सती ने पिता के यज्ञ में स्वेच्छा से स्वयं को जला कर भस्म कर दिया तो उनके जलते हुए शरीर से जो धुआँ निकला, उससे धूमावती का जन्म हुआ. इसीलिए वे हमेशा उदास रहती हैं. यानी धूमावती धुएँ के रूप में सती का भौतिक स्वरूप है. सती का जो कुछ बचा रहा- उदास धुआँ दूसरी कहानी यह है कि एक बार सती शिव के साथ हिमालय में विचरण कर रही थी. तभी उन्हें ज़ोरों की भूख लगी. उन्होने शिव से कहा मुझे भूख लगी है. मेरे लिए भोजन का प्रबंध करें, शिव ने कहा अभी कोई प्रबंध नहीं हो सकता तब सती ने कहा ठीक है, मैं तुम्हें ही खा जाती हूँ और वे शिव को ही निगल गयीं शिव, जो इस जगत के सर्जक हैं, परिपालक हैं। फिर शिव ने उनसे अनुरोध किया कि’ मुझे बाहर निकालो’, तो उन्होंने उगल कर उन्हें बाहर निकाल दिया. निकालने के बाद शिव ने उन्हें शाप दिया कि अभी से तुम विधवा रूप में रहोगी। तभी से वे विधवा हैं-अभिशप्त और परित्यक्त, भूख लगना और पति को निगल जाना सांकेतिक है. यह इंसान की कामनाओं का प्रतीक है, जो कभी ख़त्म नही होती और इसलिए वह हमेशा असंतुष्ट रहता है. माँ धूमावती उन कामनाओं को खा जाने यानी नष्ट करने की ओर इशारा करती हैं। उनका विधवापन वास्तव में स्थितप्रज्ञता है।कहानी में क्या होता है? पहले तो वे शिव को खा जाती हैं. यानी आत्मरक्षा के लिए वे किसी भी हद तक जा सकती हैं. लेकिन दूसरी ओर वे शिव का शाप भी सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं. यानी प्रकृति के, सृष्टि के नियमों को स्वीकार कर लेना चाहिए. स्थितप्रज्ञता अकर्मण्यता नही है। इसलिए माँ धूमावती रोग, शोक आौर दुख की नियंत्रक महाविद्या मानी जाती हैं. वे काफ़ी शक्तिशाली और प्रभावशाली हैं. उनके मंदिर बहुत कम हैं. बनारस के धूमावती मंदिर में लोगों का ताँता लगा रहता है जो अपनी हर प्रकार की मन्नतें पूरी करने के लिए उनके पास गुहार लगाने आते हैं।
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