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9.7.2026 छोटे बच्चों की टांगें कमजोर होती हैं। वे स्वयं नहीं चल पाते। उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाना पड़ता है। *"जब आप के बच्चे छोटे हों, तब उनकी उंगली पकड़ें, और उन्हें चलना सिखाएं। और जब वे चलना सीख जाएं, तब उनकी उंगली छोड़ दें और उन्हें दौड़ना सिखाएं।"* *"यदि आप अपने बच्चों की उंगली नहीं पकड़ेंगे, उन्हें चलना नहीं सिखाएंगे, तो वे अपने पांव पर कभी खड़े नहीं हो पाएंगे, और चलना नहीं सीख पाएंगे।"* और जब वे चलने लगें, *"तब उन्हें चलना सिखाने के बाद भी, यदि आप उनकी उंगली हमेशा पकड़े रखेंगे, और छोड़ेंगे नहीं, तो वे कभी दौड़ना नहीं सीख पाएंगे।"* इसलिए दोनों कार्य करने आवश्यक हैं। यह सारी बात कहने का एक अन्य सूक्ष्म संदेश यह भी है, कि *"अपने बच्चों को संसार में जीना सिखाएं। 20/25/30 वर्ष तक, अर्थात जब तक वे स्वात्म निर्भर न हो जाएं, स्वयं धन कमाना न सीख जाएं, उनका विवाह न हो जाए, तब तक उन्हें 'जीवन कैसे जीना है', ये बातें सिखाएं। अपने परिवार में जो पीढ़ी दर पीढ़ी अच्छी परंपराएं चली आ रही हैं, वे सारी अच्छी परंपराएं उन्हें सिखाएं। उन्हें धार्मिक बनाएं। सदाचारी बनाएं। ईमानदार चरित्रवान देशभक्त और ईश्वरभक्त बनाएं। जीवन में आने वाली समस्याओं को कैसे सुलझाया जाता है, यह सब सिखाएं।"* और जब वे स्वात्म निर्भर हो जाएं, धन कमाना सीख लें, उनका विवाह भी हो जाए, तब उन्हें छोड़ दें। फिर उनको अपने ढंग से जीने दें। *"यदि तब भी आप उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाते रहेंगे, अपनी इच्छाएं उन पर थोपते रहेंगे, तो वे स्वयं कभी भी जीना सीख नहीं पाएंगे। अपनी समस्याओं को सुलझाना नहीं सीख पाएंगे। और कभी भी अनुशासन में रहते हुए स्वेच्छापूर्वक सुख से नहीं जी पाएंगे। उन में सदा कमजोरी बनी ही रहेगी।" "हां, यदि कभी वे स्वयं आपसे कोई सलाह सम्मति लेना चाहें, तो उन्हें अवश्य दीजिए। परंतु उनके लिए हर बात का निर्देशन अब नहीं करना चाहिए।"* *"यदि आप अपने बच्चों को इस प्रकार से प्रशिक्षण देंगे, तो वे स्वात्म निर्भर एवं सुखी होंगे। और आप भी चिंताओं से मुक्त होकर अपना भावी जीवन निश्चिंतता और आनंद से जिएंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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