
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
171 days ago
राधे-राधे! प्रेमानंद महाराज जी के प्रवचनों में भीष्म पितामह और भगवान कृष्ण का प्रसंग बहुत ही भावुक और शिक्षाप्रद तरीके से सुनने को मिलता है। महाराज जी इस संबंध को केवल भक्त और भगवान का नहीं, बल्कि एक 'अनन्य प्रेम' और 'प्रतिज्ञा' के संगम के रूप में देखते हैं। महाराज जी अक्सर इन मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं: 1. भक्त की प्रतिज्ञा और भगवान का मान महाराज जी कहते हैं कि भीष्म पितामह ऐसे भक्त थे जिन्होंने भगवान को अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने पर मजबूर कर दिया। * युद्ध से पहले कृष्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि वे शस्त्र नहीं उठाएंगे। * भीष्म ने प्रतिज्ञा की— "आजु जौ हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ, तौ लाजहुँ गंगा जननी को..." (यानी अगर आज कृष्ण से शस्त्र न उठवा दिए, तो मैं गंगा पुत्र नहीं)। * महाराज जी का भाव: भगवान अपने भक्त का मान रखने के लिए स्वयं की प्रतिज्ञा तोड़ देते हैं। जब कृष्ण रथ का पहिया लेकर भीष्म की ओर दौड़े, तो वह भीष्म की भक्ति की जीत थी। 2. शरशय्या (बाणों की शैया) पर भीष्म और कृष्ण की उपस्थिति महाराज जी बताते हैं कि जब भीष्म बाणों की शैया पर लेटे थे, तब वे केवल भगवान के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे। * महाराज जी के अनुसार, भीष्म जी ने सिद्ध किया कि अंत समय में यदि दृष्टि भगवान पर टिकी हो, तो मृत्यु भी मंगलकारी बन जाती है। * कृष्ण का उनके सामने खड़े होना यह दर्शाता है कि जो जीवन भर धर्म और मर्यादा का पालन करता है (भले ही परिस्थितियाँ कठिन हों), भगवान अंत समय में स्वयं उसे लेने आते हैं। 3. 'विजया' (भीष्म स्तुति) का महत्व प्रेमानंद महाराज जी अक्सर कहते हैं कि भीष्म जी ने जो स्तुति (भीष्म स्तवराज) की थी, वह अद्भुत है। भीष्म जी ने कृष्ण से कहा था कि मेरी मति (बुद्धि) जो अब तक कुंवारी थी, उसे मैं आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। > महाराज जी की सीख: जैसे भीष्म ने अंत समय में अपनी सारी वृत्तियाँ कृष्ण में लगा दी थीं, वैसे ही हमें भी अपना मन 'नाम जप' के जरिए प्रभु में लगाना चाहिए। > 4. मर्यादा और भक्ति का संतुलन महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि भीष्म जी 'धर्म' के सूक्ष्म तत्व को जानते थे। उन्होंने अधर्म का साथ मजबूरी में दिया (कौरवों की ओर से लड़े), लेकिन उनका हृदय सदैव कृष्ण के चरणों में था। महाराज जी कहते हैं कि शरीर कहीं भी हो, मन यदि चरणों में है, तो कल्याण निश्चित है। भीष्म पितामह का प्रसंग सुनाते समय महाराज जी अक्सर भावुक हो जाते हैं क्योंकि यह "भक्त वत्सलता" का सबसे बड़ा उदाहरण है।
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