
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
26 days ago
भगवान शिव के इस स्वरूप में कैलास का वैराग्य है... नीलकण्ठ का लोकमंगल है, नन्दी का अटूट समर्पण है, भस्म का शाश्वत सत्य है और पंचवक्त्र का दिव्य रहस्य है। किन्तु क्या इन स्वरूपों का वर्णन केवल भगवान शिव की महिमा के लिए है, अथवा प्रत्येक पद अपने भीतर कोई गहन आध्यात्मिक अर्थ भी समेटे हुए है? आइए जानते हैं... वेदसार शिवस्तोत्रम् - तृतीय श्लोक गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्। भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥ पदानुसार अर्थ : • गिरीशम् — जो कैलास पर्वत के स्वामी हैं। • गणेशम् — जो समस्त शिवगणों के अधिपति हैं। • गले नीलवर्णम् — जिनका कण्ठ हलाहल विष धारण करने के कारण नीलवर्ण हो गया। • गवेन्द्राधिरूढम् — जो वृषभराज नन्दी पर आरूढ़ हैं। • गुणातीतरूपम् — जिनका स्वरूप प्रकृति के तीनों गुणों से परे है। • भवम् — जो सम्पूर्ण सृष्टि के मूल कारण तथा कल्याणस्वरूप हैं। • भास्वरम् — जो स्वयंप्रकाश, दिव्य तेज से दीप्त हैं। • भस्मना भूषिताङ्गम् — जिनके अंग पवित्र भस्म से विभूषित हैं। • भवानीकलत्रम् — जिनकी अर्धांगिनी माता भवानी हैं। • भजे — मैं ऐसे भगवान शिव का श्रद्धापूर्वक भजन एवं निरन्तर स्मरण करता हूँ। • पञ्चवक्त्रम् — जिनके पाँच दिव्य मुख हैं। श्लोक का भावार्थ : वेदसार शिवस्तोत्रम् का तृतीय श्लोक भगवान शिव के दिव्य स्वरूप के अनेक पक्षों को एक सूत्र में बाँध देता है। कैलास का वैराग्य, नीलकण्ठ का त्याग, नन्दी का समर्पण, भस्म का शाश्वत सत्य और पंचवक्त्र की दिव्यता, प्रत्येक पद के साथ शिवतत्त्व का एक नया भाव उभरता चलता है। "गिरीशम्" कैलास के अधिपति। हिमालय की निस्तब्ध शिखरों के मध्य वही धाम है, जहाँ भगवान शिव अनादिकाल से समाधिस्थ योगेश्वर रूप में विराजमान हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य के स्वामी होकर भी उनका निवास राजप्रासादों में नहीं, तप और मौन से पवित्र उस कैलास में है, जहाँ विरक्ति ही वैभव है। "गणेशम्" समस्त शिवगणों के स्वामी। भगवान शिव के समीप पहुँचकर किसी का परिचय उसके कुल, पद अथवा सामर्थ्य से नहीं होता। वहाँ श्रद्धा सबसे बड़ा सम्मान है और समर्पण सबसे बड़ी पात्रता। "गले नीलवर्णम्" समुद्रमन्थन के समय हलाहल विष से तीनों लोक संकट में पड़ गए थे। उस विकट घड़ी में भगवान शिव ने लोकमंगल के लिए विष को अपने कण्ठ में धारण कर लिया। विष उनके कण्ठ में ही ठहर गया। उसी से उनका कण्ठ नीलवर्ण हो गया। तभी से भगवान शिव नीलकण्ठ के नाम से विख्यात हुए। "गवेन्द्राधिरूढम्" भगवान शिव के सम्मुख विराजमान नन्दी अनन्य भक्ति और अटूट निष्ठा के मूर्त स्वरूप हैं। प्रत्येक शिवालय में गर्भगृह की ओर स्थिर उनकी दृष्टि एक ही भाव में निमग्न दिखाई देती है। भगवान तक पहुँचने का मार्ग श्रद्धा से आरम्भ होता है और समर्पण पर पूर्णता पाता है। नन्दी उसी अखण्ड समर्पण का स्वरूप हैं। "गुणातीतरूपम्" सत्त्व, रज और तम सम्पूर्ण प्रकृति के आधार हैं। समस्त जीव इन्हीं गुणों के प्रभाव में सुख, दुःख, राग, द्वेष और परिवर्तन का अनुभव करते हैं। भगवान शिव इन सब बन्धनों से सर्वथा परे हैं। न उनमें किसी फल की आकांक्षा है, न किसी प्रकार का विकार। इसी कारण योगी अपने चित्त को उसी परम शिवस्वरूप में स्थिर करने का प्रयास करते हैं। "भवम्" सम्पूर्ण सृष्टि का आदि उन्हीं से है और अन्त भी उन्हीं में। उत्पत्ति, पालन और संहार का अखण्ड क्रम उसी दिव्य व्यवस्था के अधीन प्रवाहित होता है। इसलिए भगवान शिव को समस्त चराचर का सनातन आधार स्वीकार किया गया है। "भास्वरम्" भगवान शिव स्वयंप्रकाश हैं। उनके तेज के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं। वही दिव्य ज्योति उनके स्वरूप की महिमा व्यक्त करती है। इसीलिए ऋषियों ने बार-बार उनका वर्णन दिव्य प्रकाश के माध्यम से किया है। "भस्मना भूषिताङ्गम्" भगवान शिव के अंगों पर विराजमान भस्म जीवन की नश्वरता की मौन साक्षी है। रूप, यौवन, वैभव और देह, काल के साथ सब भस्म में ही विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य के स्वामी होकर भी भगवान शिव उसी भस्म को धारण करते हैं। नश्वर और शाश्वत का अंतर यहीं स्पष्ट हो जाता है। "भवानीकलत्रम्" भगवान शिव और माता भवानी दो नहीं हैं। शिव बिना शक्ति पूर्ण नहीं और शक्ति बिना शिव की पूर्णता भी संभव नहीं। दोनों का यह अभिन्न स्वरूप सृष्टि के संतुलन, सृजन और कल्याण का सनातन आधार है। अन्तिम पद "भजे पञ्चवक्त्रम्" इस सम्पूर्ण श्लोक को भक्ति की मधुर परिणति तक पहुँ

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