
SHREE SHARMA
374 days ago
॥ अहिल्याकृत-श्रीरामस्तुति॥ परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥ अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥१॥ श्री रामजीके पवित्र और शोकको नाश करने वाले चरणोंका स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तोंको सुख देनेवाले श्री रघुनाथजीको देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेमके कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुखसे वचन कहनेमें नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभुके चरणोंसे लिपट गई और उसके दोनों नेत्रोंसे जल (प्रेम और आनंदके आँसुओं) की धारा बहने लगी॥१॥ धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥ मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥२॥ फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभुको पहचाना और श्री रघुनाथजीकी कृपासे भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणीसे उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञानसे जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगतको पवित्र करने वाले, भक्तोंको सुख देने वाले और रावणके शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भयसे छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥२॥ मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥३॥ मुनिने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसारसे छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धिकी बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥३॥ जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥४॥ जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजीने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलोंको ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हींको मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवानके चरणोंमें गिरकर, जो मनको बहुत ही अच्छा लगा, उस वरको पाकर गौतमकी स्त्री अहल्या आनंदमें भरी हुई पतिलोकको चली गई॥४॥ अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर। 🙏करुणामूर्ति भक्तवत्सल भगवान् श्रीरामचन्द्रकी जय🌹🚩

Comments (11)

SHREE SHARMA
Aug 22, 2025
धन्यवाद दीदी🙏🌹🙏

Saumya Sharma
Aug 22, 2025
रामायण महाग्रंथ की बहुत ही सुन्दर हृदयस्पर्शी पंक्तियां 👌👌👌🙏🌹☺️

Saumya Sharma
Aug 22, 2025
जय माता दी 🙏🌹🙏 लक्ष्मी की बरसात हो, सरस्वती का सर पर हाथ, शुभ लाभ मिलता रहे गणपति जी का साथ, संतोषी संतोष दें, जैसे हों हालात, जीवन में होती रहे खुशियों की बरसात 🙏🌹☺️ शुभ मंगलकामनाओं के साथ सुप्रभात वंदन भैया जी 🙏🌹☺️ आपका दिन शुभ व मंगलमय हो 🙏🌹☺️

Rama Devi Sahu
Aug 21, 2025
Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏 Mangal Kamanayen ke Sath Subha Ratri Jii 🌹🌹🌹🌹🌹

SHREE SHARMA
Aug 21, 2025
आप से निवेदन है महोदय ॐ साईं बाबा ना लिखे ,

Rama Devi Sahu
Aug 21, 2025
Siya bar Ram Chandra ki Jai Ho 🙏 Bahut hi Sundar Pracchad ( Abhishapta Sati Ahalya ki Kahani)..... Dhanyawad...

Rama Devi Sahu
Aug 21, 2025
Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏 Prabhu Shri Ram Ji ki Aasirbad Aap pr Sadeib Banaye Rakhe 🙏Aap ka Mangal Ho....🌹🌹🌹🌹
