
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
175 days ago
*महाभारत का वो रहस्यमयी प्रसंग… जो सीधे आज के कलियुग से जुड़ा है* यह कथा है राजा परीक्षित की मृत्यु और कलियुग के आरम्भ की — एक ऐसा प्रसंग जो जितना गूढ़ है, उतना ही आज के समय से जुड़ा हुआ भी है। जब श्रीकृष्ण ने अपनी धरती लीला समेटने का संकेत दिया, तब पांडवों ने संसार की नश्वरता को समझ लिया। उन्होंने हस्तिनापुर का राजपाट अपने पौत्र परीक्षित को सौंपा और द्रौपदी संग हिमालय की ओर तपस्या हेतु प्रस्थान किया। राजा परीक्षित धर्मनिष्ठ और पराक्रमी शासक थे। लेकिन एक अदृश्य संकट उनके राज्य में प्रवेश कर चुका था — कलियुग! द्वापर का अंत महाभारत युद्ध के साथ हो चुका था, पर श्रीकृष्ण के रहते कलियुग अपनी शक्ति नहीं दिखा पा रहा था। जैसे ही प्रभु ने प्रस्थान किया, कलि ने मनुष्यों के मन में धीरे-धीरे अधर्म, क्रोध और अहंकार घोलना शुरू कर दिया एक दिन परीक्षित को सूचना मिली कि उनके राज्य में कलि का प्रभाव बढ़ रहा है। वे उसे खोजते-खोजते एक विचित्र दृश्य पर पहुँचे—एक दुर्बल वृद्ध व्यक्ति गाय और बैल को बेरहमी से पीट रहा था। बैल केवल एक पैर पर खड़ा था! राजा तुरंत समझ गए — यह साधारण दृश्य नहीं, बल्कि एक प्रतीक है! गाय = धरती बैल = धर्म धर्म के चार स्तंभ होते हैं — तप, सत्य, पवित्रता और दया। सतयुग में चारों मजबूत थे, त्रेता में तीन, द्वापर में दो… और कलियुग में धर्म केवल एक पैर — “सत्य” पर टिका रह गया है, जो धीरे-धीरे डगमगा रहा है। राजा ने तलवार उठाई, पर कलि ने बुद्धि का खेल खेला। उसने कहा, “राजन! यह तो प्रकृति का नियम है, आप समय के नियम को कैसे रोक सकते हैं?” राजा को बात सही लगी, पर उन्होंने समझौता किया तू केवल उन स्थानों पर रहेगा जहाँ अधर्म का वास हो। कलि को चार स्थान मिले: जुआघर बूचड़खाना मदिरालय वेश्यालय फिर उसने एक और स्थान माँगा… और राजा ने उसे सोने में रहने की अनुमति दे दी! बस यहीं से खेल पलट गया… कलि राजा के स्वर्ण मुकुट में बैठ गया और धीरे-धीरे उनकी बुद्धि को भ्रमित करने लगा। एक दिन जंगल में भटके, प्यासे और थके राजा ऋषि सामिक के आश्रम पहुँचे। ऋषि ध्यान में लीन थे, उन्होंने उत्तर नहीं दिया। तभी कलि ने उनके मन में अहंकार जगाया — “आप राजा हैं… और यह ऋषि आपकी अवहेलना कर रहा है! क्षणिक क्रोध में राजा ने मृत सर्प उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यहीं से विनाश का बीज बोया गया जब ऋषि के पुत्र शृंगी ने यह अपमान देखा, तो क्रोध में श्राप दे दिया सातवें दिन तक्षक नाग के दंश से इस राजा की मृत्यु होगी! श्राप का समाचार मिलते ही परीक्षित ने सिंहासन पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और शुकदेव जी से श्रीमद्भागवत का श्रवण करने लगे। सात दिनों की कथा ने उनके हृदय से मृत्यु का भय ही समाप्त कर दिया… और सातवें दिन तक्षक नाग ने अपना कार्य कर दिया क्रोधित जनमेजय ने सर्प मेध यज्ञ कराया, जिसमें असंख्य सर्प आहुति में गिरने लगे। इसी यज्ञ में वैश्यंपायन जी ने पहली बार महाभारत की कथा का वाचन किया… और यहीं से यह महान ग्रंथ मानवता तक पहुँचा संदेश क्या है? कलियुग बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है जब मन में अहंकार, लालच, मद और क्रोध जगह बना लेते हैं और जब “सत्य” का अंतिम स्तंभ भी डगमगाने लगता है। यह कथा केवल इतिहास नहीं बल्कि आज के युग का आईना है।

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