
Rama Devi Sahu
320 days ago
#रामायणजी की सिद्धचौपाई!! 🌞🚩🌞🚩🌞🚩🌞🚩🌞 1. मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सु दसरथ अजिर बिहारी॥1॥ भावार्थ:- जो मंगल करने वाले और अमंगल हो दूर करने वाले है, वो दशरथ नंदन श्री राम है वो मुझपर अपनी कृपा करे।॥1॥ *|| जय श्री राम ||* 2. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥2॥ भावार्थ:- जो भगवान श्री राम ने पहले से ही रच रखा है,वही होगा। हम्हारे कुछ करने से वो बदल नही सकता।॥2॥ *|| जय श्री राम ||* 3. हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी आपद काल परखिये चारी॥3॥ भावार्थ:- बुरे समय में यह चार चीजे हमेशा परखी जाती है, धैर्य, मित्र, पत्नी और धर्म।॥3॥ *|| जय श्री राम ||* 4. जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू॥4॥ भावार्थ:- सत्य को कोई छिपा नही सकता, सत्य का सूर्य उदय जरुर होता है।॥4॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥ब्याधू॥17॥ 5. हो, जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥5॥ भावार्थ:- जिनकी जैसी प्रभु के लिए भावना है उन्हें प्रभु उसकी रूप में दिखाई देते है।॥5॥ *|| जय श्री राम ||* 6. रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई॥6॥ भावार्थ:- रघुकुल परम्परा में हमेशा वचनों को प्राणों से ज्यादा महत्व दिया गया है।॥6॥ *|| जय श्री राम ||* 7. हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता कहहि सुनहि बहुविधि सब संता॥7॥ भावार्थ:- प्रभु श्री राम भी अंनत हो और उनकी कीर्ति भी अपरम्पार है,इसका कोई अंत नही है। बहुत सारे संतो ने प्रभु की कीर्ति का अलग अलग वर्णन किया है।॥7॥ *|| जय श्री राम ||* 8. बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥8॥ भावार्थ:- मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है॥8॥ || जय श्री राम || 9. सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥9॥ भावार्थ:- वह रज सुकृति (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुंदर कल्याण और आनन्द की जननी है, भक्त के मन रूपी सुंदर दर्पण के मैल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है॥9॥ || जय श्री राम || 10. श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥10॥ भावार्थ:- श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है, वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥10॥ || जय श्री राम ||

Comments (2)

Rama Devi Sahu
Oct 14, 2025
🙏🌹 Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏🌹

