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SHREE SHARMA

405 days ago

“जयंती" और "जन्माष्टमी" में अंतर ..... * सबसे पहले जानते है जयन्ती का अर्थ क्या होता है ...... जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः स्कन्दमहापुराण,तिथ्यादितत्त्व . जो जय और पुण्य प्रदान करे उसे जयन्ती कहते हैं । कृष्ण जन्माष्टमी से भारत का प्रत्येक प्राणी परिचित है । इसे कृष्णजन्मोत्सव भी कहते हैं । किन्तु जब यही अष्टमी अर्धरात्रि में पहले या बाद में रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो जाती है तब इसकी संज्ञा “कृष्णजयन्ती” हो जाती है ......... . रोहिणीसहिता कृष्णा मासे च श्रावणेSष्टमी । अर्द्धरात्रादधश्चोर्ध्वं कलयापि यदा भवेत् । जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी ।। . और इस जयन्ती व्रत का महत्त्व कृष्णजन्माष्टमी अर्थात् रोहिणीरहित कृष्णजन्माष्टमी से अधिक शास्त्रसिद्ध है । इससे यह सिद्ध हो गया कि जयन्ती जन्मोत्सव ही है । . अन्तर इतना है कि योग विशेष में जन्मोत्सव की संज्ञा जयन्ती हो जाती है । यदि रोहिणी का योग न हो तो जन्माष्टमी की संज्ञा जयन्ती नहीं हो सकती...... . चन्द्रोदयेSष्टमी पूर्वा न रोहिणी भवेद् यदि । तदा जन्माष्टमी सा च न जयन्तीति कथ्यते ॥–नारदीयसंहिता . कहीं भी किसी मृत व्यक्ति के मरणोपरान्त उसकी जयन्ती नहीं अपितु पुण्यतिथि मनायी जाती है । . भगवान् की लीला का संवरण होता है । मृत्यु या जन्म सामान्य प्राणी का होता है । भगवान् और उनकी नित्य विभूतियाँ अवतरित होती हैं । और उनको मनाने से प्रचुर पुण्य का समुदय होने के साथ ही पापमूलक विध्नों किम्वा नकारात्मक ऊर्जा का संक्षय होता है । इसलिए हनुमज्जयन्ती नाम शास्त्रप्रमाणानुमोदित ही है ........... . ”जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः” –स्कन्दमहापुराण, तिथ्यादितत्त्व . जैसे कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता मात्र रोहिणी विरहित अष्टमी से बढ़ जाती है । और उसकी संज्ञा जयन्ती हो जाती है । ठीक वैसे ही कार्तिक मास में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से स्वाती नक्षत्र तथा चैत्र मास में पूर्णिमा से चित्रा नक्षत्र का योग होने से कल्पभेदेन हनुमान जन्मोत्सव की संज्ञा ”हनुमान जयन्ती” होने में क्या सन्देह है ?? . एकादशरुद्रस्वरूप भगवान् शिव ही हनुमान् जी महाराज के रूप में भगवान् विष्णु की सहायता के लिए चैत्रमास की चित्रा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा को अवतीर्ण हुए हैं............... . ”यो वै चैकादशो रुद्रो हनुमान् स महाकपिः। अवतीर्ण: सहायार्थं विष्णोरमिततेजस: ॥" . –स्कन्दमहापुराण,माहेश्वर खण्डान्तर्गत, केदारखण्ड-८/१०० . पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रानक्षत्रसंयुते ॥ . चैत्र में हनुमान जयन्ती मनाने की विशेष परम्परा भारत में प्रचलित है और कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता है।

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