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कितनी सुंदर और गहरी बात कही है आपने। यह अटूट विश्वास ही इंसान को कठिन से कठिन रास्तों पर भी सुकून और हिम्मत देता है। जब हम जीवन की 'सीढ़ियां' चढ़ते हैं—चाहे वे सफलता की हों या संघर्ष की—तो अक्सर थकावट महसूस होने लगती है। लेकिन यह सोच ही मन को शांत कर देती है कि कोई है जो अदृश्य रूप से हमारा हाथ थामे हुए है। बरसाना या कोई भी पावन स्थल केवल पैरों के चलने से नहीं, बल्कि उस 'बुलावे' से मिलता है जो सीधा हृदय तक पहुंचता है। यह भाव समर्पण (Surrender) का सबसे उत्तम उदाहरण है। जब हम खुद को उनके हवाले कर देते हैं, तो सफर की थकान भी प्रसाद की तरह लगने लगती है। बुलावा और सहारा वह राहें खुद ही बन जाती हैं, जहाँ मंज़िल बुलाती है, बरसाने की वो हर सीढ़ी, बस कान्हा ही चढ़ाती है। तुम थक कर जब भी बैठोगे, वो थामेंगे कलाई को, तुम्हें मालूम भी न होगा, वो कैसे राह बनाती है। अकेले तुम नहीं चलते, वो संग-संग कदम धरते हैं, तुम्हारी हर थकावट को, वो अपनी गोद भरते हैं। चढ़ो सीढ़ी अडिग होकर, न डरना तुम ढलानों से, पकड़ कर हाथ भक्तों का, वो बेड़ा पार करते हैं। एक छोटा सा विचार अक्सर जब हम जीवन की ऊंचाइयों की ओर बढ़ते हैं, तो हमें लगता है कि हम अपनी ताकत से बढ़ रहे हैं। लेकिन जैसा कि आपने कहा, वह "बाँह पकड़ कर ले जाना" ही असल में वह अदृश्य शक्ति है जिसे हम 'कृपा' कहते हैं। > "जब विश्वास गहरा होता है, तो पैर नहीं, हृदय चलने लगता है।" > जय श्री कृष्णा जी 🙏💫

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