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*🌹ईश्वर को यदि पाना है तो पहले अपने जीवन को समझें🌹* 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 *⭕सच्चा मंदिर आपका अंतर्मन है, इसलिए ईश्वर की खोज अपने भीतर करें। ईश्वर हर जगह व्याप्त हैं, उन्हें मंदिरों में खोजना व्यर्थ है। मन, वचन और कर्म से शुद्ध होकर ईश्वर को महसूस किया जा सकता है। भूखे को रोटी में और रोगी को डॉक्टर में ईश्वर दिखते हैं। सच्ची भक्ति से ईश्वर हमेशा साथ रहते हैं।* *सच्चा मंदिर आपका अंतर्मन है, ईश्वर को पाना है तो अंतर्मन को शुद्ध कर आत्मा को बनाना होगा उसका निवास, ईश्वर की खोज बाहर नहीं, भीतर शुरू होती है। यदि वास्तव में ईश्वर को पाना है, तो पहले अपने जीवन को इतना शुद्ध और निर्मल बनाना होगा कि उसमें ईश्वर की झलक स्पष्ट दिखाई दे। हम प्रायः ईश्वर को मंदिरों, मूर्तियों या तीर्थस्थलों तक सीमित कर देते हैं और मानते हैं कि वहीं से ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। हम ईश्वर को एक ही स्थान पर या एक ही प्रतिमा में देखना चाहते हैं, परंतु सत्य यह है कि ईश्वर सर्वत्र हैं, हर स्थान, हर व्यक्ति और हर क्षण में विद्यमान।* ईश्वर के सच्चे दर्शन के लिए बाहरी यात्राओं से अधिक आंतरिक साधना की आवश्यकता है। जब मन, वचन और कर्म से व्यक्ति ईश्वरीय चेतना में डूबा रहता है, तब ईश्वर उसके अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं। यह दृष्टिकोण अपनाकर, हम हर दिन, हर क्षण ईश्वर को महसूस कर सकते हैं। ईश्वर को पाना वास्तव में कठिन नहीं, यदि हम अपने दृष्टिकोण को बदलें और अपनी आत्मा को ईश्वरीय भाव से जोड़ दें। भूखे व्यक्ति को रोटी में ईश्वर दिख सकता है, बीमार होने पर रोगी को डॉक्टर में ईश्वर दिख सकता है। ईश्वर की चैतन्य शक्ति अलग-अलग प्राणियों और वस्तु में अलग-अलग दिखाई अवश्य देती है, किन्तु वे एक ही के भिन्न रूप हैं। अद्वैत की स्थिति को ऐसे समझें, यदि हम इंद्रधनुष के रंगों को अलग-अलग देखें तो एक-दूसरे में रूपांतरित होते दिखाई देंगे। जैसे ये सात रंग अलग-अलग दिखाई देते हुए भी एक श्वेत रंग से ही निकले हैं, ठीक वैसे ही सूर्य की श्वेत किरणें सात रंग में विभक्त होकर दिखाई देती हैं। सच्चे हृदय से पुकारने पर ईश्वर संकट अवश्य दूर करते हैं, गज और ग्राह की कथा भी इसकी पुष्टि करती है, द्रौपदी की लाज बचाने के प्रसंग में भी यह बात पढ़ने को मिलती है, पौराणिक कथाओं में ध्रुव व प्रह्लाद का नाम इसी संदर्भ में लिया गया है। भक्ति और प्रीति जिसके मन जितनी होती है, वहां प्रभु सदैव विद्यमान रहते हैं - जब सभी देवता अपने कष्टों से पीड़ित होकर एकत्र हुए, तो वे विचार करने लगे कि प्रभु को कहां जाकर अपनी व्यथा सुनाई जाए। कोई बैकुंठ का मार्ग सुझाता था, तो कोई क्षीरसागर जाने की बात करता। किसी ने कहा कि प्रभु वहां मिलते हैं जहां भक्ति और प्रेम हो। रामचरितमानस के बालकाण्ड में कहा गया है, *•'हरि व्यापक सर्वत्र सुजाना। प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना।'* तुलसीदास इस प्रसंग के माध्यम से ईश्वर की तीन महत्वपूर्ण विशेषताएं बताते हैं, पहला, ईश्वर व्यापक हैं, वे किसी एक स्थान या समय से बंधे नहीं हैं। दूसरा, वे सर्वत्र उपस्थित हैं, हर कण में व्याप्त हैं और तीसरा, वे प्रेम से प्रकट होते हैं। सार केवल यह है कि उस ईश्वर के दर्शन करना बहुत सरल है, केवल निर्मल मन होना चाहिए, ईश्वर आपके सामने उपस्थित हो जाएंगे। *🚩#हरिऊँ🚩* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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