
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
248 days ago
25.12.2025 संसार में प्रायः ऐसा देखा जाता है, कि *"जब कोई विद्वान अपने तन मन धन से देश धर्म की सेवा करता है, तब उसके जीवनकाल में लोग उसका मूल्य प्रायः नहीं समझते, अथवा बहुत थोड़ा समझते हैं। वे उस विद्वान से कोई विशेष लाभ भी नहीं लेते। उसकी यथोचित सेवा नहीं करते, उसे उचित सम्मान और सुविधाएं भी नहीं देते।"* *"परन्तु जब वह विद्वान संसार छोड़कर चला जाता है, तब उससे होने वाले लाभ समाज को नहीं मिलते। तब समाज को उस विद्वान का मूल्य कुछ कुछ समझ में आता है। परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।" "तब लोग दुखी होते हैं, पश्चाताप करते हैं, कि हमने उस विद्वान से कोई विशेष लाभ नहीं लिया, और वह हमें छोड़कर चला गया।"* *"जैसे जलते हुए दीपक में यदि घी डाला जाए तो दीपक जलता रहता है, वह अच्छा चमकता है और लोगों को भी उससे प्रकाश मिलता रहता है। दीपक बुझ जाने पर घी डालने से न तो दीपक की चमक बनी रहती है, और न ही लोगों को कोई प्रकाश का लाभ मिलता है।"* *"इसी प्रकार से यदि किसी विद्वान के जीवित रहते हुए उससे यथोचित लाभ लिया जाए और उसको उचित सेवा सम्मान दिया जाए, तो उसे भी लाभ होता है, और समाज को भी।" "परन्तु उस विद्वान के संसार से चले जाने के बाद उसकी स्मृति में आप कितनी ही श्रद्धांजलि सभाएं कर लें, उससे न तो उस विद्वान को कोई लाभ होगा, और न समाज को।"* *"अतः अपने आसपास के विद्वानों गुणवान और बुद्धिमान व्यक्तियों का मूल्य समझें, उन से शीघ्र लाभ लेवें। कभी ऐसा न हो, कि उसके जाने के बाद फिर आपको भी पश्चात्ताप करना पड़े।"* *"उनके जीवन काल में ही यथायोग्य उनका सम्मान करें और उनकी सेवा भी करें। इससे उन विद्वानों का जीवन भी सुखमय ढंग से बीतेगा, तथा आपको तो दुगुना लाभ होगा। एक तो - उन विद्वानों से आप को विद्या मिलेगी। और दूसरा - उनकी सेवा करने का पुण्य भी मिलेगा।"* ----- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात."*

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