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रोटी हमारी थाली तक पहुँचने से पहले एक बहुत ही लंबी और कठिन यात्रा तय करती है। आपकी बात बिल्कुल सत्य है कि जब हम भोजन में छोटी-सी कमी निकालकर उसे फेंक देते हैं, तो हम उस अन्न के मोल को ही नहीं, बल्कि उसके पीछे जुड़ी अनगिनत भावनाओं और मेहनत को भी अनदेखा कर देते हैं। आइए, इस यात्रा के उन अनकहे पहलुओं को समझें जो खेत से लेकर हमारी थाली तक जुड़े हैं: ### १. किसान की अनथक मेहनत (खेती से कटाई तक) रोटी की कहानी शुरू होती है एक बंजर या कठोर मिट्टी से, जिसे किसान अपने पसीने से सींचता है: * **कड़ी धूप और ठंड:** किसान जलती हुई धूप, कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश की परवाह किए बिना खेतों में हल चलाता है, बीज बोता है और फसल की रखवाली करता है। * **अनिश्चितता:** फसल का उगना पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है—कभी सूखा, कभी बाढ़, तो कभी ओले उसकी महीनों की मेहनत को पल भर में बर्बाद कर देते हैं। इन सब जोखिमों को उठाकर वह हमारे लिए अन्न पैदा करता है। ### २. माता-पिता का समर्पण (चूल्हे तक का सफर) जब वही अनाज घर पहुँचता है, तो एक माँ और एक पिता उसे परिवार तक पहुँचाने के लिए अपनी जान लगा देते हैं: * **पिता का संघर्ष:** पिता दिन-रात मेहनत करके, धूप-छाँव सहकर उस अनाज को खरीदने के लिए पैसे कमाता है या अपनी फसल को बाजार तक पहुँचाता है। * **माँ का स्नेह:** माँ उसी अनाज के एक-एक दाने को चुनती है, उसे पीसकर आटा बनाती है और फिर चूल्हे की तपिश सहते हुए गोल-गोल रोटियाँ सेंकती है। उस समय उसके मन में सिर्फ एक ही भावना होती है—*"मेरा परिवार भूखा नहीं रहना चाहिए।"* > **"अन्न ब्रह्म है।"** जब हम भोजन की थाली में से थोड़ा सा भी खाना जूठा छोड़कर या बिना बात के कमियाँ निकालकर फेंक देते हैं, तो हम वास्तव में उस किसान के श्रम और माता-पिता के त्याग का अपमान कर रहे होते हैं। > अगली बार जब भी थाली में खाना लें, तो उतना ही लें जितनी भूख हो, ताकि किसी किसान के पसीने और माँ के प्रेम का एक भी कतरा यूँ ही बेकार न जाए।

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