
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
4 days ago
*_🚩 ॥ नवम स्वरूप : माँ सिद्धिदात्री ॥ 🚩_* *_॥ अष्टसिद्धियों व नवनिधियों की अधिष्ठात्री ॥_* `🌸 बीज प्रार्थना —` *_सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।_* *_सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥९॥_* `भावार्थ — सिद्ध , गन्धर्व , यक्ष , असुर , अमर आदि द्वारा सेवित — समस्त/सभी सिद्धियों की दात्री ( देनेवाली ) — कल्याण प्रदान करें ।` 〰️〰️📖✡️📖〰️〰️ *_🌺 ॥ स्वरूप वर्णन ॥_* `माँ दुर्गाजी की नवम शक्ति सिद्धिदात्री — अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों की अधिष्ठात्री हैं । देवीपुराण के अनुसार सिद्धिदात्री की अनुकंपा से ही शिव अर्द्धनारीश्वर स्वरूप को प्राप्त हुए —` `ये कमलपुष्प पर विराजमान तथा सिंहवाहिनी हैं । दाहिने हाथों में चक्र औऱ गदा व बायें हाथों में शंख एवं कमलपुष्प धारण किये हुए हैं । व्यक्ति को ब्रह्माण्ड विजय की क्षमता देती हैं । भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली आप श्रीत्रिपुरसुंदरी हैं ।` `माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं । इनका वाहन सिंह है । ये कमलपुष्प पर भी आसीन होती हैं । इनकी दाहिनी ओर के नीचे वाले हाथ में चक्र , ऊपर वाले हाथ में गदा औऱ बायीं ओर के नीचे वाले हाथ में शङ्ख एवं ऊपर वाले हाथ में कमलपुष्प है ।` 〰️〰️📖✡️📖〰️〰️ `🌺 ॥ ध्यान मंत्र ॥` *_कञ्चनाभा शङ्खचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वला ।_* *_स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते ॥_* *_या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी या माहिषोन्मूलिनी ,_* *_या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी ।_* *_शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिदात्री परा ,_* *_सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ॥_* `अर्थात — जो मधु–कैटभादि दैत्यों का दलन करने वाली , महिषासुर उन्मूलिनी , धूम्रलोचन–चण्ड–मुण्ड मथनी , रक्तबीज का भक्षण करने वाली , शुम्भ–निशुम्भ दैत्य दलनी , परा सिद्धिदात्री हैं — वे नवकोटि मूर्तियों सहित विश्वेश्वरी मेरी रक्षा करें ।` 〰️〰️📖✡️📖〰️〰️ *_🌺 ॥ महात्म्य — क्यों करें पूजा ॥_* `मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा , गरिमा , लघिमा , प्राप्ति , प्राकाम्य , ईशित्व एवं वशित्व — ये आठ सिद्धियाँ होती हैं ।` `ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण–जन्मखण्ड में यह संख्या अट्ठारह बतायी गयी है —` `१. अणिमा , २. लघिमा , ३. प्राप्ति , ४ प्राकाम्य , ५. महिमा , ६. ईशित्व , वशित्व ,७. सर्वकामावसायिता , ८. सर्वज्ञत्व , ९. दूरश्रवण , १०. परकायप्रवेशन , ११. वाक्सिद्धि , १२. कल्पवृक्षत्व , १३. सृष्टि , १४. संहारकरणसामर्थ्य , १५. अमरत्व , १६. सर्वन्यायकत्व , १७. भावना , १८. सिद्धि ।` `माँ सिद्धिदात्री भक्तों औऱ साधकों को ये समस्त/सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं । देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था । इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था । इसी कारण वह लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए ।` `नवरात्र पूजन के नवें दिन इनकी उपासना की जाती है । इस दिन शास्त्रीय विधि–विधान तथा पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को समस्त/सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है । सृष्टि में कुछ भी उसके लिये अगम्य नहीं रह जाता । ब्रह्माण्ड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य उसमें आ जाता है ।` `प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरन्तर प्रयत्न करे । उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो । इनकी कृपा से अनन्त दुःखरूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है ।` `नव दुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अन्तिम हैं । अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा–उपासना शास्त्रीय विधि–विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा–पूजा के ९वें दिन इनकी उपासना में प्रवृत्त होते हैं । इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों औऱ साधकों की लौकिक व पारलौकिक समस्त/सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है ।` `किन्तु सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है , जिसे वह पूर्ण करना चाहे । वह समस्त/सभी सांसारिक इच्छाओं , आवश्यकताओं एवं स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिकरूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा–रस–पीयूष का निरन्तर पान करता हुआ , विषय–भोग–शून्य हो जाता है ।` `माँ भगवती का परम् सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है । इस परम् पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती । माँ के चरणों का यह सान्

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
