MyMandirInstall

रुक्मिणी जी की जिज्ञासा और राधा दर्शन कथा की शुरुआत द्वारिका से होती है, जहाँ एक बार भगवान कृष्ण एकांत में "राधा-राधा" पुकारते हुए भावविभोर हो जाते हैं। उन्हें इस अवस्था में देखकर माता रुक्मिणी के मन में श्री राधा जी के दर्शन की इच्छा जागृत होती है। वे प्रभु से प्रार्थना करती हैं कि वे उस स्वरूप के दर्शन करना चाहती हैं जिनका नाम लेकर प्रभु की आँखों से अश्रु बहने लगते हैं। उचित समय आने पर, जब ब्रजवासी और द्वारिका का परिकर प्रभास क्षेत्र में एकत्रित होते हैं, तब प्रभु रुक्मिणी जी को अकेले राधा जी के दर्शन के लिए भेजते हैं। राधा रानी का अलौकिक स्वरूप जब रुक्मिणी जी राधा जी के महल के द्वार पर पहुँचती हैं, तो वे वहाँ खड़ी एक सखी को देखकर ही ठिठक जाती हैं। उस सखी का सौंदर्य इतना अद्भुत होता है कि रुक्मिणी जी को लगता है कि यही राधा जी हैं। जैसे-जैसे वे महल की सात ड़ियों (सीढ़ियों) को पार करती हैं, हर सीढ़ी पर उन्हें एक नई सखी मिलती है, जिसका रूप करोड़ों लक्ष्मियों से भी अधिक दिव्य होता है। अंत में जब वे श्री राधा जी के समक्ष पहुँचती हैं, तो उनके तेज और अनुपम सौंदर्य को देखकर स्तब्ध रह जाती हैं। राधा जी के स्वरूप का वर्णन करते हुए महाराज जी कहते हैं कि उनका रूप "नित्य नवायमान" है, जो हर क्षण बदलता और निखरता रहता है। रुक्मिणी जी का विस्मय और प्रभु का उत्तर राधा जी के दर्शन कर जब रुक्मिणी जी वापस लौटती हैं, तो उनकी आँखों से अश्रु बह रहे होते हैं। वे कृष्ण से पूछती हैं कि "आप इनके बिना जीवित कैसे रहते हैं?" रुक्मिणी जी स्वीकार करती हैं कि अब तक वे अपनी और अन्य पटरानियों की शक्तियों पर गर्व करती थीं, लेकिन राधा जी के प्रेम और रूप के आगे सब फीका है। तब प्रभु उन्हें समझाते हैं कि वे कभी राधा जी से दूर नहीं होते, वे सदैव उनके हृदय में और उनके समीप ही रहते हैं। राधे राधे

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!