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पंढरपुर में एक धनी-मानी सेठ अपने कल्याण के लिए तुलादन का उत्सव किया करता था। वो पलड़े में एक तरफ़ ख़ुद बैठ जाता था और दिसरी तरफ़ सोना चाँदी तौल कर संतों में बाँट देता था। . एक वैष्णव ने कहा यदि आपने जीवन में नामदेव जी की सेवा नहीं की तो क्या किया। सेठ ने पहले नौकर को भेजा तो नामदेव जी ने कहा हमें आवश्यकता नहीं। . फिर सेठ ने अपने मुनीम को भेजा तो नामदेव जी ने कहा कि ये दूसरे ब्राह्मणों में बाँट दें, हम तो संतुष्ट हैं। फिर वो स्वयं गया और चरणों में प्रणाम किया और दान लेने की प्रार्थना की। . नामदेव जी ने देखा कि इन्हें धन का बड़ा अभिमान है, तो उन्होंने पूछा कि हम जितना माँगेंगे उतना दे देंगे? सेठ ने कहा, जी बिलकुल! . नामदेव जी अपने साथ एक तुलसी का पत्ता लेकर गये। उन्होंने तुलसी के पत्ते पर "राम" का आधा नाम "रा" लिख दिया। लिख के कहा मुझे बस वजन का सोना दे दो. एक पलडे में तलसी का पत्ता जिस पर राम का आधा नाम लिखा था और दूसरे में सोना। . सेठ ने कहा इसमें कितना सोना ही आएगा, मेरा मज़ाक़ उड़ा रहे हो क्या? नामदेव जी ने कहा बस इतना ही चाहिए। सेठ ने कुछ सोना रखा पर पलड़ा नहीं हिला। . उसने पाँच-सात किलो और सोना रखा, पर पलड़ा नहीं हिला। अब उसने अपना सारा सोना चाँदी और अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों से भी सब लेकर रख दिया, पर पलड़ा फिर भी नहीं हिला। . नामदेव ने कहा कि चलो इसका धन का अभिमान तो चला गया, लेकिन एक और अभिमान बाक़ी था। . उसे अपने पुण्य और पहले किए कई तुलादानों का बड़ा अभिमान था। नामदेव जी ने कहा तुमने जो भी दान, पुण्य, तीर्थ आदि किए हों, एक संकल्प लेके इस पलड़े में दे दो, शायद उठ जाए। . कुछ नहीं हुआ, तुलसी जी का पलड़ा हिला भी नहीं। अब वो सेठ नामदेव जी के चरणों में गिर पड़ा और कहा कि मैं गरीब आपको क्या दे सकता हूँ, आप तो भगवान के नाम के धनी हैं! . नामदेव जी यही सुनना चाहते थे, उन्होंने इसी अहंकार को नष्ट करने के लिए यह लीला की थी। नामदेव जी की इस शिक्षा से उसके हृदय का मैल दूर हो गया और उसने दैन्य भाव से प्रभु की भक्ति में अपनी बुद्धि को लगा दिया। . एक भक्त का कैसे भी संग हो जाए, उससे जीवन परिवर्तन हो जाता है। जैसा नामदेव जी के हृदय में प्रभु के लिये प्रेम था, उस धनी पुरुष के हृदय में भी वैसा ही प्रेम आ गया।

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