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भक्ति और समर्पण अक्सर उन परिस्थितियों में सबसे अधिक निखरते हैं जहाँ बाहरी सुख-सुविधाओं का अभाव होता है। भक्ति और परीक्षा उस विधवा माँ का नाम पार्वती था। वह सारा दिन दूसरों के खेतों में काम करती और जो कुछ भी रुखा-सूखा मिलता, उसे पहले माँ दुर्गा को भोग लगाती। उसका बेटा, छोटा सा "माधव", अक्सर भूख से व्याकुल हो जाता, पर अपनी माँ की श्रद्धा देखकर कभी शिकायत नहीं करता था। एक बार गाँव में भयंकर अकाल पड़ा। पार्वती को कई दिनों तक काम नहीं मिला। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं बचा था। माधव भूख से बेहाल होकर सो गया, लेकिन पार्वती पूरी रात माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने दीया जलाकर भजन गाती रही। चमत्कार की रात कहा जाता है कि उस रात एक अत्यंत तेजस्वी महिला उनके द्वार पर आई। उनके हाथ में एक छोटी सी पोटली और दूध का पात्र था। उन्होंने पार्वती से कहा, "बेटी, मैं राहगीर हूँ, क्या तुम मुझे रात गुजारने की जगह दोगी?" पार्वती ने नम्रता से उन्हें अंदर बुलाया और कहा, "माँ, मेरे पास खिलाने को तो कुछ नहीं है, पर आप यहाँ विश्राम कर सकती हैं।" उस महिला ने मुस्कुराते हुए अपनी पोटली खोली और उसमें से गरम-गरम पूड़ियाँ और हलवा निकाला। उन्होंने वह भोजन पार्वती और माधव को खिलाया। अटूट विश्वास का फल अगली सुबह जब पार्वती की आँख खुली, तो वह महिला वहाँ नहीं थी। लेकिन घर का कोना-कोना अनाज की बोरियों से भरा हुआ था और मंदिर में रखी माँ दुर्गा की प्रतिमा के चरणों में वही खाली पोटली पड़ी थी। पार्वती की आँखों से आँसू बहने लगे; उसे समझ आ गया कि उसकी सच्ची पुकार माँ ने सुन ली है। सीख: इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अगर इंसान का चरित्र और विश्वास अडिग रहे, तो ईश्वर स्वयं सहायता के लिए हाथ बढ़ाते हैं।

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