
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
148 days ago
4.4.2026 *"जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।"* इस कहावत के अनुसार *"जब व्यक्ति का मन शुद्ध होता है, तब वह शुद्ध दृष्टि से संसार को देखता है। और पक्षपात रहित होकर दूसरों के गुण दोषों का विवेचन करता है। मन के शुद्ध होने के कारण वह दूसरों के दोषों पर अधिक ध्यान नहीं देता, बल्कि गुणों पर दृष्टि रखता है। उनके गुणों को धारण करने का प्रयत्न करता है। दूसरों के गुणों की प्रशंसा करता है। ऐसा व्यक्ति सुखी रहता है।"* *"और जब किसी का मन अशुद्ध होता है, तब उसकी दृष्टि पक्षपात पूर्ण होती है। तब वह दूसरों के गुणों को नहीं देखता, बल्कि दोषों पर अधिक ध्यान देता है। दोषों पर ध्यान देने से उसके अंदर दूसरों के दोष आने लगते हैं, और वह दूसरों के दोषों का खंडन करने लगता है। इससे उसकी मानसिक शांति खो जाती है, तथा चिंता तनाव और उसके मन में अशांति उत्पन्न होती है। उसकी दृष्टि पक्षपातपूर्ण होने के कारण अनेक बार तो उसके गुण भी दोष के रूप में दिखाई देते हैं। ऐसा व्यक्ति सदा दुखी रहता है।"* *"इसलिए यदि आप सुखी होना चाहते हों, तो अपने मन को शुद्ध रखें। पक्षपात रहित दृष्टि से संसार को देखें। दूसरों के गुणों पर ध्यान देवें, उन्हें धारण करने का प्रयत्न करें, और सुख से जीवन जिएं।" "यदि इसके विपरीत आचरण किया, तो आप जीवन भर दुखी रहेंगे, तथा आपका जीवन निष्फल हो जाएगा।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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