
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
20 days ago
. *🕉️बाबा_वैद्यनाथजी_कथा🕉️* 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 *🪦रावण की घोर तपस्या, आत्मलिंग की प्राप्ति और देवघर में बाबा वैद्यनाथ के प्राकट्य की अद्भुत गाथा:—* *भारत की पवित्र भूमि पर भगवान शिव के अनेक धाम हैं, परंतु बाबा वैद्यनाथ धाम की महिमा कुछ अलग ही है। यह वह पावन भूमि मानी जाती है जहाँ लंकाधिपति रावण की अद्भुत शिव-भक्ति, उसकी कठोर तपस्या और स्वयं महादेव की करुणा की कथा जुड़ी हुई है।* *आज भी झारखंड के देवघर में स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम में भक्त श्रद्धा से पुकार उठते हैं—* *“बोल बम! हर हर महादेव! जय बाबा वैद्यनाथ!”* *कहा जाता है कि यहाँ भगवान शिव भक्तों के लिए केवल देव नहीं, बल्कि वैद्य—अर्थात् दुखों और बंधनों का उपचार करने वाले परम चिकित्सक के रूप में विराजमान हैं।* *📿रावण कौन था?* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* रावण केवल लंका का राजा नहीं था। वह अत्यंत विद्वान, वेद-वेदांगों का ज्ञाता, महान तपस्वी और भगवान शिव का अनन्य उपासक माना जाता है। उसके भीतर असाधारण शक्ति थी। उसने कठोर साधनाएँ की थीं और अनेक दिव्य वर प्राप्त किए थे। लेकिन उसके व्यक्तित्व में एक बड़ा विरोधाभास भी था—अत्यंत विद्या और भक्ति के साथ अत्यंत अहंकार भी। यही कारण है कि रावण की कथा हमें यह समझाती है कि भक्ति से शक्ति तो प्राप्त हो सकती है, लेकिन शक्ति का सदुपयोग न किया जाए तो वही शक्ति पतन का कारण बन जाती है। रावण भगवान शिव को लंका में स्थापित करना चाहता था। उसकी इच्छा थी कि स्वयं महादेव लंका में निवास करें, जिससे उसकी नगरी अजेय और परम पवित्र हो जाए। वह भगवान शिव की आराधना करने कैलाश की ओर गया। कैलाश पहुँचकर उसने महादेव की कठोर तपस्या आरंभ कर दी। दिन बीते... महीने बीते... ऋतुएँ बदलती रहीं... लेकिन रावण की तपस्या समाप्त नहीं हुई। उसका शरीर तप से क्षीण होने लगा, पर उसकी साधना और भी प्रचंड होती गई। उसके मुख से केवल एक ही नाम निकलता था— *🚩“ॐ नमः शिवाय।”* भावार्थ में कहा जा सकता है— *🚩न धनं न राज्यं न स्वर्गं न मोक्षं,* *ममैकं वाञ्छितं शम्भो तव भक्ति* `•अर्थात्—` हे शम्भो! मुझे धन, राज्य या स्वर्ग से अधिक आपकी भक्ति की आकांक्षा है। *📿जब महादेव फिर भी प्रकट नहीं हुए* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* रावण ने और भी कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। कथा-परंपरा के अनुसार उसने अपने एक-एक सिर को भगवान शिव को अर्पित करना आरंभ किया। एक सिर अर्पित किया... फिर दूसरा... फिर तीसरा... इस प्रकार वह अपने सिर भगवान शिव को समर्पित करता गया। रावण की इस भक्ति में अत्यंत कठोरता थी, परंतु उसकी भावना इतनी प्रबल थी कि अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए। जब वह अपना अंतिम सिर भी अर्पित करने को तत्पर हुआ, तभी— आकाश शिवमय हो उठा। दिशाओं में दिव्य प्रकाश फैल गया। डमरू की ध्वनि सुनाई देने लगी। और स्वयं भगवान महादेव उसके सामने प्रकट हो गए। *📿स्वयं प्रकट हुए भगवान शिव* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, कंठ में सर्प, शरीर पर भस्म और हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए भगवान शिव रावण के सामने खड़े थे। महादेव ने कहा— “रावण! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। वर माँगो।” रावण ने भगवान शिव को प्रणाम किया। उसकी सबसे बड़ी इच्छा यही थी कि शिव स्वयं उसके साथ लंका चलें। उसने महादेव से प्रार्थना की— “हे देवाधिदेव! हे महेश्वर! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मेरे साथ लंका चलकर वहाँ निवास कीजिए।” भगवान शिव ने उसकी भक्ति देखकर उसे एक दिव्य शिवलिंग प्रदान किया। इसी प्रसंग से आगे चलकर वैद्यनाथ धाम की कथा जुड़ती है। *📿महादेव ने रखी एक शर्त* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* भगवान शिव ने रावण को शिवलिंग देते हुए कहा कि— “इसे मार्ग में कहीं पृथ्वी पर मत रखना। यदि यह भूमि पर रख दिया गया, तो फिर इसे वहाँ से उठाना संभव नहीं होगा।” रावण ने भगवान की आज्ञा स्वीकार की। उसने शिवलिंग को अपने साथ लिया और लंका की ओर चल पड़ा। उसके मन में अपार आनंद था। उसे लगा कि अब स्वयं महादेव उसके राज्य में निवास करेंगे। *📿देवताओं में चिंता* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* जब देवताओं को पता चला कि भगवान शिव का दिव्य लिंग लंका ले जाया जा रहा है, तो वे चिंतित हुए। उनके मन में भय था कि यदि यह दिव्य शिवलिंग लंका में स्थापित हो गया तो रावण की शक्ति अत्यंत बढ़ जाएगी। देवताओं ने भगवान विष्णु का स्मरण किया। भगवान गणेश ने लीला की। कथा के एक प्रचलित रूप में कहा जाता है कि रावण को मार्ग में लघुशंका की आवश्यकता अनुभव हुई। लेकिन उसके हाथ में शिवलिंग था। अब वह शिवलिंग को पृथ्वी पर रख भी नहीं सकता था। उसी समय उसे एक बालक दिखाई दिया। वह बालक वास्तव में भगवान गणेश की लीला से प

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