
SHREE SHARMA
420 days ago
#चातुर्मास में #भगवान क्यों #शयन करते हैं? यहाँ भगवान विष्णु के देवशयन की संपूर्ण, विस्तृत और संदर्भयुक्त विवेचना प्रस्तुत की जा रही है, जिसमें सभी प्रमुख बिंदुओं को पौराणिक दृष्टिकोण, तात्त्विक रहस्य और मानव जीवन पर प्रभाव के साथ समाहित किया गया है। #देवशयनी_एकादशी और भगवान #विष्णु का चार महीने का शयन देवशयनी एकादशी क्या है? देवशयनी एकादशी (जिसे हरिशयनी या पद्मा एकादशी भी कहते हैं) आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह दिन चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है। देवशयन की मूल कथा (पुराणों से) स्रोत ग्रंथ: #स्कन्द_पुराण – वैष्णव खंड #पद्म_पुराण – उत्तर खंड #भागवत_महापुराण – स्कंध 11 #विष्णु_धर्मोत्तर_पुराण #हरिवंश_पुराण कथा विस्तार: जब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से इस तिथि के विषय में पूछा, तब भगवान ने बताया: “हे राजन! आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीनों तक ब्रह्मा, शिव और अन्य देवगण संसार संचालन करते हैं। इस काल को चातुर्मास कहा जाता है।” इस दिन से भगवान का संसारिक कार्यों से अल्पकालिक विराम आरंभ होता है। श्लोक (पद्म पुराण): “एकादश्यां शुभे तिथौ शयनं याति माधवः। चातुर्मास्यं तु तेनैव प्रोक्तं धर्मभृतां वर॥” #योगनिद्रा क्या है? “योगनिद्रा” कोई सामान्य निद्रा नहीं, बल्कि सक्रिय ध्यानावस्था है, जिसमें भगवान जगत से अपनी सक्रियता को सीमित कर लेते हैं परंतु उनका आंतरिक चैतन्य कार्य चलता रहता है। यह चेतना की वह अवस्था है जिसमें भगवान गर्भस्थ ब्रह्मांडीय शक्ति की तरह कार्य करते हैं। इसका उल्लेख देवी महात्म्य में देवी की योगनिद्रा के रूप में भी होता है। चातुर्मास क्या है? चातुर्मास का अर्थ है ‘चार महीने’। यह समय वर्षा ऋतु से शरद ऋतु तक फैला होता है — आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक। माह नाम धार्मिक कर्म आषाढ़ प्रारंभ देवशयन, गुरुपूर्णिमा श्रावण शिव पूजन सावन सोमवार भाद्रपद विष्णु पूजन जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी आश्विन शक्ति पूजन नवरात्रि, दशहरा कार्तिक देवउठनी तुलसी विवाह, दीपावली भगवान क्यों शयन करते हैं? (तात्त्विक विवेचना) (i) सृष्टि की पुनर्रचना हेतु प्रत्येक युगचक्र में एक विश्राम समय की आवश्यकता होती है — यह चार महीने सृष्टि की ऊर्जा को पुनः समेटने और उसे व्यवस्थित करने के समय हैं। (ii) मानव जीवन में अनुशासन लाने हेतु इस काल में संयम, ब्रह्मचर्य, व्रत, स्वाध्याय, ध्यान और आत्मनियमन को अत्यंत महत्व दिया गया है। (iii) प्रकृति का चक्र वर्षा ऋतु में शरीर की अग्नि क्षीण रहती है, अतः नियमपूर्वक आहार-विहार और व्रत की परंपरा स्वास्थ्यवर्धक होती है। प्रमुख परंपराएं #भगवान का शयनोत्सव: मंदिरों में इस दिन भगवान विष्णु को सुंदर शैय्या पर सुलाया जाता है। यह सांकेतिक है कि वे अब चार महीने तक विश्राम करेंगे। तुलसी पूजन: चातुर्मास में तुलसी के समीप दीप जलाना, विशेषकर ब्रह्ममुहूर्त में, अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। चातुर्मास व्रत: कुछ व्यक्ति विशेष (साधु-संन्यासी) इन चार महीनों में एक स्थान पर रहकर कठोर नियमों से तप करते हैं। देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल): जागरण चार महीने बाद, कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इस दिन को प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। तुलसी विवाह इस दिन तुलसी और भगवान विष्णु (शालिग्राम) का विवाह होता है। यह नवजीवन और शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत का प्रतीक है। इस काल में वर्जित कार्य चातुर्मास में विशेष रूप से कुछ कार्य वर्जित माने गए हैं: वर्जित कार्य कारण विवाह एवं शुभ कार्य देवता शयन में होते हैं यात्राएं वर्षा, रोग, असुरक्षा अधिक तामसिक भोजन पाचन शक्ति कमजोर होती है बाल कटाना / दाढ़ी बनाना सन्यास जीवन के निकट लाने हेतु वैज्ञानिक पक्ष यह समय मानसून जनित रोगों के कारण स्वास्थ्य के लिए सावधानीपूर्ण होता है। उपवास और सात्विकता से पाचन तंत्र एवं प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। संयम और ब्रह्मचर्य मानसिक स्थिरता लाते हैं — जिससे साधना सफल होती है। निष्कर्ष: देवशयनी एकादशी केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, यह संयम, साधना, ब्रह्मचर्य और पुनर्जागरण का काल है। यह आध्यात्मिक आत्म-संयम और सामाजिक अनुशासन का अनुपम उदाहरण है, जो हमारे ऋषियों ने चातुर्मास के रूप में व्यवस्थित किया।

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