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तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती॥ रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥ भावार्थ:-और हे कामदेव के शत्रु! आप भी दिन-रात आदरपूर्वक राम-राम जपा करते हैं- ये राम वही अयोध्या के राजा के पुत्र हैं? या अजन्मे, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं?॥ भावार्थ: माता सती का अनन्य मोह और अज्ञान झलकता है। उन्होंने देखा कि भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता के वियोग में साधारण मनुष्यों की तरह रो रहे हैं और वृक्षों से उनका पता पूछ रहे हैं। सती के मन में संशय हुआ कि जो परम ब्रह्म (ईश्वर) पूरी सृष्टि का स्वामी है, वह एक स्त्री के लिए इस तरह व्याकुल कैसे हो सकता है?वह शिवजी से पूछ रही हैं कि यदि राम सचमुच राजा के बेटे (साकार रूप) हैं, तो आप उनका जप क्यों करते हैं? और यदि वे निराकार, अजन्मा ब्रह्म हैं, तो वह इस तरह इंसानों की तरह कष्ट क्यों भोग रहे हैं? यहाँ सगुण (साकार) और निर्गुण (निराकार) के बीच का भ्रम दर्शाया गया है, जिसे बाद में शिवजी दूर करते हैं कि सगुण और निर्गुण दोनों एक ही ईश्वर के दो रूप हैं। सीमित तार्किक बुद्धि से असीमित ईश्वर (या परम सत्य) को नहीं समझा जा सकता।जब हम किसी दिव्य शक्ति या सत्य को केवल बाहरी रूप (चमत्कार या संकट) से आंकते हैं, तो भ्रमित हो जाते हैं।पूर्ण श्रद्धा के बिना ज्ञान अधूरा है। संशय आत्मा का पतन करता है, इसलिए सत्य को जानने के लिए अहंकार और अज्ञान को छोड़ना जरूरी है। मानसिक संशय और भ्रम का नाश: जिस प्रकार शिवजी सती के भ्रम को मिटाते हैं, इस प्रसंग को सुनने से मनुष्य के मन में चल रही दुविधाएं, संशय और नकारात्मक विचार समाप्त होते हैं।सच्ची श्रद्धा का जागरण: यह प्रसंग सिखाता है कि तर्क से ऊपर उठकर जब आप पूर्ण विश्वास अपनाते हैं, तभी आपको आत्मिक शांति मिलती है।राम नाम की महिमा का बोध: जब स्वयं देवों के देव महादेव चौबीसों घंटे राम नाम का जप करते हैं, तो इसे सुनने से साधारण मनुष्य को भी नाम-जप की शक्ति का अहसास होता है, जिससे मन शांत और एकाग्र होता है।अहंकार की मुक्ति: सती का संशय उनके सूक्ष्म अहंकार के कारण था। इसे सुनने और समझने से मनुष्य के भीतर का 'मैं' (अहंकार) शांत होता है। 🙏🌹🌻!!जय श्रीराम!!🌻🌹🙏

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