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संयम की तपस्या : सत्ता के बीच ऋषि-मार्ग जो संयम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सत्ता-सान्निध्य के बावजूद बनाए रखा है, वही उसे उन महान ऋषियों की श्रेणी में स्थापित करता है जिनका एकमात्र लक्ष्य, “कामये दुःखतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्” रहा है। बारह वर्षों के केंद्र शासन और लगभग सत्तर प्रतिशत राज्यों में अनुकूल सत्ता के पश्चात भी संघ के किसी प्रचारक, कार्यवाह या स्वयंसेवक ने न धैर्य खोया, न मर्यादा। अन्यथा इतिहास साक्षी है—सत्ता मिलते ही बाह्य और आंतरिक संकट जन्म लेने लगते हैं। इन वर्षों में संघ के समक्ष चुनौती केवल कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना नहीं था, बल्कि यह भी था कि सत्ता की एंटी-इन्कम्बेंसी की चोट वीतराग, मासूम स्वयंसेवकों पर न गिरे—और यदि गिरे भी, तो वे उसे सह सकें। साथ ही सत्ता से मिलने वाले लाभ और आकर्षण से स्वयं को बचाए रखना—यह और भी कठिन तपस्या थी। निराशा अवश्य थी, किंतु वह व्यक्तिगत आकांक्षाओं की नहीं थी। वह पीड़ा राष्ट्र-यज्ञ की धीमी गति, नई चुनौतियों और अपेक्षित परिणामों में विलंब की थी। — मंदिर अब तक क्यों नहीं बना? — सेना पर हमले अब भी क्यों? — लव जिहाद, डेमोग्राफी जैसे विषयों पर समाज में बात करना इतना कठिन क्यों? ये प्रश्न सत्ता से पूछे जाने चाहिए थे, किंतु समाज के बीच सदा उपलब्ध होने के कारण संघ से पूछे गए। वह हिंदू समाज, जो दशकों की यातना के बाद भी अपराधबोध से ग्रस्त था, जिसे विश्वास में लेना एक धीमी, संवेदनशील और करुण प्रक्रिया थी—उसे संभालना किसी भी त्वरित, आक्रामक उपाय से संभव नहीं था। संघ चाहता तो सत्ता की हुंकार में बहुत कुछ बाईपास कर सकता था, किंतु उसने ऐसा नहीं किया। न लूट, न बंदरबांट, न अपने लिए योजनाएँ—बल्कि और अधिक उत्तरदायित्व। सरकारों को भी एक नया दृष्टिकोण मिला— सबके लिए शौचालय, घर, बिजली, पानी, शिक्षा और अवसर। यह संसार का शायद सबसे निष्पक्ष और वास्तविक कल्याण-पथ था। आज देश बदल रहा है जो साइकिल पर चलते थे, वे कार में हैं। जहाँ युगों तक अंधकार था, वहाँ उजाला है। जो कीपैड नहीं जानती थी, वह यूट्यूब से हुनर सीख रही है। पर संघ कार्यालय आज भी लगभग वैसे ही हैं— वही कठोर गद्दा, वही सस्ती कुर्सियाँ, वही सादगी। वही प्रचारक, वही सफेद पाजामा, वही आत्म-विस्मरण। संघ आज भी वही कर रहा है जो वह 1925 में करने चला था। संयम, चरित्र और राष्ट्र-पीड़ा की सुलगती अग्नि के साथ। वे दिन में मुस्कराकर सब सहते हैं और रात के अंधेरे में आज भी दीन-दुखियों के लिए रोते हैं। इस कोलाहल में संघ आज भी वही सहन कर रहा है जो एक सती, एक संत, एक शूर या एक गौ सहती है, बिना शिकायत, बिना जल्दबाज़ी। वह मंथर गति से पर अडिग संकल्प के साथ इतिहास के सबसे बड़े खेल की ओर बढ़ रहा है। — यही उसका चरित्र है। #संयम #राष्ट्रसाधना #साधना_का_मार्ग

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