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*सबसे बड़ा पाप है खुद को कमजोर समझना. कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन अपनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने के विचार से ही कांपने लगे थे, तब श्री कृष्ण ने उन्हें जो सीख दी, वह केवल एक योद्धा के लिए नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन के संघर्षों में खुद को कमजोर महसूस करता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को 'आत्मबल' का बोध कराते हुए कुछ मुख्य बातें समझाई थीं: * क्लीब्यं मा स्म गमः पार्थ (नपुंसकता को प्राप्त मत हो): कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यह कायरता तुम्हारे जैसे वीर को शोभा नहीं देती। हृदय की इस तुच्छ कमजोरी को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। * स्वधर्म का पालन: उन्होंने समझाया कि एक व्यक्ति का सबसे बड़ा पाप अपने कर्तव्य (धर्म) से पीछे हटना है। फल की चिंता किए बिना कर्म करना ही सच्ची शक्ति है। * आत्मा की अमरता: "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि..." के माध्यम से उन्होंने बताया कि शरीर नश्वर है, पर आत्मा अमर है। इसलिए मृत्यु या हार का भय पालना अज्ञानता है। * मोह का त्याग: अर्जुन की कमजोरी का कारण अपनों के प्रति उनका 'मोह' था। कृष्ण ने सिखाया कि जब बात न्याय और सत्य की हो, तो भावनाओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने देना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता का सार यही है कि मनुष्य अपने विचारों से निर्मित होता है। यदि वह खुद को पराजित मान ले तो वह हार जाता है, और यदि वह संकल्प कर ले तो वह अपराजेय है।

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